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Friday, January 27, 2012

कैसे कह दूं कि उसी शख्स से नफरत है मुझे !

कैसे कह दूं
कि उसी शख्स से
नफरत है मुझे !

वही जो शख्स
मेरे ख्वाब तोड़ देता है,
वही उन ख्वाबों के
होने का पर सबब भी है...
मेरी हयात के
पुर्जे बिखेरने वाला,
मेरी साँसों को सजाने का
वो ही ढब भी है...

मैं चाहता नहीं पर
जिसकी जरूरत है मुझे !
कैसे कह दूं
कि उसी शख्स से
नफरत है मुझे !


मेरी शिकस्त में है
और सफ़र के हौसलों में भी...
ख़ुशी में जीत की
पैरों के आबलों में भी...

वही ज़मीन है
पैरों के नीचे,
छत भी है.... ,
वही मिटाने की
जुम्बिश-ओ-हरारत भी है...

मगर तन्हाई में भी
उसकी ही आदत है मुझे
कैसे कह दूं
कि उसी शख्स से
नफरत है मुझे !

Friday, December 16, 2011

जानाँ के नाम… (नन्ही नज़्में)

मोनालिसा
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

रात मुसव्विर
आँखें मूँदे सोच रही थी…
रंग कौन सा भरे
ख्वाब के कैनवास पर

तेरी खुशबू के नक्श
उकेरे थे फिर उसने…

"दा-विन्ची" ने भी
क्या जानाँ…,
कभी सोचा था तुमको ?
मोनालिसा फिर तेरी
परछाईं सी क्यों है !

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गुज़ारिश
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

गुज़ारिश एक है तुम से ....

मेरी ख़ामोशी ने
जितने तराने छेड़े हैं
तुम पर ...
कभी महसूसना उन को
कभी उन पर थिरक लेना

मुकम्मल साज़ हो लेंगे
मेरे अलफ़ाज़ हो लेंगे
गुजारिश एक है तुमसे ...

मेरी पलकों के कोरों पर
जो आंसू सहमे रहते हैं
हंसी की ओट में हर पल...
कभी तुम भीगना उन में
कभी उन संग सिसक लेना

मेरी तकलीफ के लब पर
तबस्सुम खिलखिलाएगी
मोहब्बत खिलती जायेगी ..
गुजारिश एक है तुमसे ...

Tuesday, December 6, 2011

आज कल बे-ईमान बहुत हो गये हो तुम...

आज कल बे-ईमान
बहुत हो गये हो तुम.

वजूद अपना जो छोड़ा था
तुम्हारी निगहबानी में...
उसका कतरा भी कोई
अब नही मिलता मुझको
वो सब तुमने छुपा
कर रख लिया है
और इंतेहाँ ये
कि इक इल्ज़ाम
बेवफ़ाई का
मेरे सर कर दिया है

करार-ए-ज़िंदगी
के वो कुछ सफ़हे
जिन्हे चश्मदीद रखा था
ये सब कुछ सौंपते तुमको
तुम्हारे हक़ में
गवाही देने लगे हैं

मुक़दमा ख़ास है ना ये
अदालत ये तुम्हारी है ,
मुद्दई तुम, तुम्हीं मुन्सिफ
वकालत भी तुम्हारी है.

लो मैं कबूलता हूँ
जुर्म अपना...!
सुनो, अब फ़ैसले में
देर मत करो जानाँ ...
अपने आगोश में
उम्र-क़ैद की सज़ा दे दो!

Wednesday, November 23, 2011

मेरे हमसफ़र तू बिछड़ गया ...

मेरे हमसफ़र तू बिछड़ गया !

मगर फिर भी क्यों तेरी आहटें
मेरे जेहन-ओ-दिल में खनक रहीं ...
तेरे जिस्म में थीं जो खुशबुएँ
मेरे बाम-ओ-दर पे महक रहीं ...

क्यों तेरे ख़याल का अंजुमन
है फलक का नूर बना हुआ
वो तबस्सुमों का हिजाब है
मेरे सोच-ओ-सच पे तना हुआ

मेरी ज़िन्दगी का हर एक गुल
क्यों है तेरे नाम खिला हुआ ...
मेरी सांस का हर तार क्यों
तेरी धडकनों से मिला हुआ ...

मेरे हमसफ़र जो हुआ है ये
कि तू दिख रहा है ख़फ़ा-ख़फ़ा
गर सच है ये तो मुझे बता
कि तू कब है मुझसे जुदा हुआ ...

मेरे हमसफ़र तू बिछड़ गया ...
मगर मुझसे कब है जुदा हुआ .

Thursday, September 8, 2011

कहो क्या नाम दूँ तुमको !

कहो क्या नाम दूँ तुमको !

सहर में तुम,शफक़ में तुम
परिंदों की चहक में तुम,
परस्तिस में, इबादत में
सलीके में, नफ़ासत में

लिखावट में, ज़बानी में
मेरी हर इक कहानी में....
तसव्वुर बस तुम्हारा है ।

मेरी साँसें, मेरी धड़कन
ये मेरी रूह का पैराहन
तेरे सदके मेरी जाना
ये इंतेज़ाम सारा है...

मेरी शोहरत, मेरी चाहत
मेरी रुसवाइयां तुम से
मेरी नफ़रत, मेरी तोहमत
मेरी अच्छाईयाँ तुम से

मैं क्या ईनाम दूँ तुमको !
मैं क्या इल्ज़ाम दूँ तुमको !

कहो क्या नाम दूँ तुमको ?

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तुम्हारी याद भर से नज़्म…
रक्स करती है काग़ज पर…
तसव्वुर से तुम्हारे,
शेर सब परवाज़ भरते हैं…

तेरे आगोश में सिमटूँ
तो मैं गुलज़ार हो जाऊँ…!

Thursday, August 11, 2011

दर्द की जाने शख्सियत क्या है …!

दर्द की जाने शख्सियत क्या है !

किसी के दिल में मोम जैसा है
छलक पड़ता है रूह जलते ही
कभी जलता है उम्र भर को ये
कोई परवाना संग मिलते ही

कभी रिसता है पानियों कि तरह
जेहन की दीवारों को नमी देकर
कभी ताबीर ये मुहब्बत की
किसी की चाह को जमीं दे कर

कभी पत्थर सा सख्त होता है
दिल की धड़कन को सर्द करता हुआ
कभी मखमल के उजले फाहे सा
किसी नफ़रत के जख्म भरता हुआ

किसी की याद के धुएँ जैसा
कभी अम्बर में घुलता जाता है
कभी पारे सा मनचला हो कर
किसी भी सिम्त बढ़ता जाता है ...

दर्द की जाने शख्सियत क्या है !

Friday, July 1, 2011

यूँ सीने से न लगा मुझको....

ए मेरे दोस्त
यूँ सीने से न लगा मुझको ...

दर्द कोई
फिर न छलक जाए
मेरे जख्मों से ...
बाँध कर जब्त कर
रखा है जिसे
कोई आंसू न ढलक आये
मेरी नज्मों से ...

ए मेरे दोस्त ......
यूँ सीने से न लगा मुझको !

मेरी आँखों में
रौशनी नजर आई जो तुम्हे
वो मेरी सुलगी हुई
धड़कन के सिवा कुछ भी नहीं
ख़ाक हो जाए न
ये रेशमी दामन तेरा
मेरी मोहब्बत का अब
हासिल है सिला कुछ भी नहीं

ए मेरे दोस्त ......
यूँ सीने से न लगा मुझको

मैं तो टूटा हुआ
एक तारा हूँ
उफक के दरिया में
डूबता सा कहीं
तू मुझको बाँधने की
न तमन्ना कर
मेरे संग तू भी बिखर
न जाए कहीं ...

ए मेरे दोस्त ......
यूँ सीने से न लगा मुझको

Sunday, May 22, 2011

तुम्हारा नाम आया था ...

मैं जब भी टूट कर बिखरा ,
मुकद्दर देख कर सिहरा ,
मुझे ढाढस बंधाने को ..
ग़मों में भी हंसाने को ..
तुम्हारा नाम आया था ...

खिजाँ की बदलियाँ छायीं ,
उजाले जब थे परछाईं ,
दिया बन जगमगाने को...
मुझे रस्ता दिखाने को ...
तुम्हारा नाम आया था ...

दिखी तकदीर की वहशत,
छिनी जब हर मेरी नेमत ,
दुआ में मुझको लाने को ...
ख़ुदा बन कर बचाने को ...
तुम्हारा नाम आया था .....

मगर उस वक़्त-ए-आख़िर जब

उखरती जाती थीं साँसें ,
बुझी जाती थीं ये आँखें ,
मेरी धड़कन बढ़ाने को ...
हमें जिंदा दिखाने को ...
तुम्हारा नाम न आया ....

हमने कर ली जो थी ठानी,
वो पहली बार मनमानी ,
मेरे सजदा-ए-आख़िर पर...
मेरे होठों की जुम्बिश पर ...

मुझे रुखसत कराने को ,
हमें मिट्टी दिलाने को ,
तुम्हारा नाम आया था ...

तुम्हारा नाम आया था ...!

Tuesday, April 12, 2011

आवारा नींदें ..

कितनी रातों से
आवारा घूमती हैं
मेरी नींदें ..

यूँ तो हर रोज़
तुम्हारी याद की ईंटें
अपने एहसास की जमीन पर
बिछाता हूँ ....
तेरे रुखसार के नक़्शे
की शिकन पा कर
मुद्दतों
आशियाँ बनाता हूँ ..

फकत इक ख्वाब की जुम्बिश
तेरी जुदाई की जानाँ ...
ये सब कुछ तोड़ जाती है
और मेरी नींद को
हर शब्
खुले छत छोड़ जाती है ...

न कोई मरमरी घर दो
तुम अपने साथ का जानाँ
तो इक अंगीठी तबस्सुम की
जला दो जेहन में मेरे

हरारत जिसकी ले के मैं
हर इक शब् जागता बैठूँ
इस बंजारे को अब तो कोई
छत मयस्सर हो ..

कितनी रातों से
आवारा घूमती हैं
मेरी नींदें ..!

Sunday, March 13, 2011

कुछ वित्तीय खुराफ़ातें … :)

ये जालिम ज़माना मुझ प्रेमी-मन को जबरन वित्तीय गणित सिखाने की कोशिश में है कि हम कुछ इन्सान हो जायें ! और हम ठहरे देसी कुत्ते की खालिस दुम …… "इको-नामिक्स" में भी "प्रेमो-नामिक्स" पढ़ने लगे और जो कुछ पढ़े वो आप सब के सामने रख रहे हैं ………… झेलिये ... :P

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इन्फ्लेशन

मैं ढेरों खर्चता हूँ
अपने ख्वाब के सिक्के
तब कहीं जा कर थोड़ा सा
"तुम" खरीद पाता हूँ

इन्फ्लेशन* बहुत बढ़ गयी है
तुम्हारे तसव्वुर के देश में.

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घाटा

मैने तो खर्च डाली है
सारी मुहब्बत तुम्हारे कोटे की
तुमने ही जाने क्यों भरा नही
अपने हिस्से का उलफती-राजस्व

कहो तो कैसे कम होगा भला
इस बरस का ये मोहब्बतीय घाटा.

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कमीशन

मैं हर रोज
चाँद से खरीदता हूँ
तुम्हारे ख्वाब के शेयर...
बेईमान रात
हर रोज काट लेती है
कमीशन उस से...

"सेबी"* सूरज से
ज़रा कर दो ना शिकायत उसकी !




इन्फ्लेशन* --inflation -- मुद्रास्फीति
सेबी -- SEBI -- Securities & Exchange Board of India.

Tuesday, March 8, 2011

ख़्वाबों का उड़न खटोला था ...

उस रोज़ फलक हिंडोला था
इक ख्वाब देर तक डोला था

तब चाँद उठा था दरिया से
जब शाम ने सूरज घोला था

कुछ बादल थे सौगात मिले
और कुछ तारों को मोला था

फिर उसके दिल पे दस्तक कि
और उसने झरोखा खोला था

दिल दोनों छिटक कर उछले थे
और हमने उफक टटोला था

लम्हों को थाम दिया उसने
ये वक़्त भी कितना भोला था

पर आँख खुली तो गायब था
ख़्वाबों का उड़न खटोला था


ये किस्सा सा है,एक ख्वाब का,जो हक़ीकत के बेहद करीब का है पर फिर भी एक ख्वाब कि ही तरह झूठा :)। Confused !!
मैं भी Confused हूँ कि इसे ग़जल कहूँ या नज़्म……! खैर जो भी है…झेलिये

Wednesday, March 2, 2011

खेल-खेल में …

रस्सा-कशी
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

आसमान के प्ले ग्राउंड में
हम-तुम पहुंचे
चाँद से बाँधा सूरज
ज्या की डोरी से

तुमने सिरा
चाँद का थामा
मैंने सूरज थाम लिया

अब रस्सा-कशी का खेल
हुआ करता है हरदम
जो तुमने खींचा
सांझ ढली
जो मैंने खींचा
भोर हुई ।



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स्ट्राईकर

~~~~~~~~~~~

लोग रहते हैं
गोटियों की मानिंद..
ज़िन्दगी की बिसात
बिखरी पड़ी है ...
कितनी ही बार
छू के गुजरे हैं
अपनी मंजिल का
रास्ता पा कर ...

मैं
सबके साथ बढता जाता हूँ
फिर तनहा लौट आता हूँ
कैरम के स्ट्राईकर की तरह ..

सबके हमसफ़र का
कोई अपना सफ़र नहीं होता !

Monday, February 7, 2011

दो साइंटिफ़िक नज़्में … :)

ज़िन्दगी का त्रिभुज
~~~~~~~~~~~~~

बचपन में
कई बार पढ़ा था
भुजाएं त्रिभुज की
अपने अनुपात बदल कर
कोणों के मान
बदल देतीं हैं अक्सर

उम्र मुद्दत से खड़ी है
वक़्त के त्रिभुज में
हर पल ख़ुशी और ग़म
के अनुपात गिनती हुई

और मैं
कब से बैठा
हिसाब लगा रहा हूँ जाने ..
मगर ज़िन्दगी
हर बार "थीटा" की तरह
मायने बदल जाती है !



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धरती का कोर
~~~~~~~~~~~

मेरे जेहन की धरती में
कुछ पत्थर से एहसासों
के बहुत नीचे
तुम्हारी याद का गर्म लावा
चक्कर लगाता रहता है हरदम

और उस से निकलने वाली तरंगें
अपने महफूज़ आगोश में
समेटे रहती हैं मुझको ...
जहाँ ग़म का कोई सूरज
कभी जला नहीं पता है मुझको

बहुत सकते में हूँ जानाँ
जबसे सुना है ये
कि किसी दिन
धरती का कोर
रुक जायेगा जम कर
और ये इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कवच
टूटेगा… बिखर जाएगा !

मैं जानता हूँ यूँ
कि मुहब्बत
किसी आइन्स्टीन या डार्विन का
सिद्धांत नहीं ..
मगर सच्ची बताओ जानाँ
कहीं तुम भी तो नहीं ................................. !

[एक जियो-फिज़िक्स के जर्नल में एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ था कुछ वक़्त पहले की धरती का कोर [क्रोड़] जो लगातार घूमता रहता है और जिस से उत्पन्न इलेक्ट्रो-मॅग्नेटिक फील्ड धरती की रक्षा करता है विध्वंसक सौर-तरगों [अल्ट्रा-वायलेट और इन्फ़्रा-रेड रेज] से, उसकी गति धीमी हो रही है और कुछ सौ सालों में ये रुक जाएगा और ये फील्ड ख़त्म हो जाएगी । इस विषय पर एक फ़िल्म भी बन चुकी है।....चूँकि फिज़िक्स मेरा पसंदीदा सब्जेक्ट रहा है और वो जर्नल मेरे हाथ आया कुछ वक़्त पहले तो कुछ कहने की कोशिश की है इस पर.... झेलिए ! :P :P]

Thursday, February 3, 2011

फिर से उसी नाम से पुकार मुझे...

कि भिगो दे ये मोहब्बत का आब'शार मुझे
मेरी जाँ फिर से उसी नाम से पुकार मुझे!

भोर को पैकर-ए-माहताब मे ढलता देखूं
जिस्म का मोम तेरी लौ से पिघलता देखूं

तुझमे में खो कर ही आएगा अब करार मुझे
मेरी जाँ फिर से उसी नाम से पुकार मुझे !

अपने मसले में जमाना नही मुनसिफ़ होगा
अपना अंजाम भी औरों से मुक्तलिफ़ होगा

इन हसीं ख्वाबों का होने दे ऐतबार मुझे
मेरी जान फिर से उसी नाम से पुकार मुझे!

अपना अफ़साना रहती तारीख़ तलक गूंजेगा
ये ज़मीन गाएगी धुन मे, ये फलक गूंजेगा

क्यों डराते हैं और फानी से किरदार तुझे
मेरी जाँ फिर से उसी नाम से पुकार मुझे !

लोग उठाते हैं गर निगाह तो उठाने दे
तू मुझको-ख़ुदको मुहब्बत में डूब जाने दे

पूरा करने दे अब उल्फ़त का शाहकार मुझे
मेरी जाँ फिर से उसी नाम से पुकार मुझे !


ये नज़्म दरअसल एक दूसरी नज़्म को पढते हुए जन्मी थी… तो इसे उस नज़्म की पूरक मान सकते हैं। पहली नज़्म "साँझ " की ब्लॉग पर है…!

Sunday, January 30, 2011

जुड़वां मुन्तजिर आँखें…

ज़िन्दगी की सड़क पर
ख्वाबों ने, रफ़्तार जो पकड़ी
न जाने हमकदम कितने
मैं पीछे छोड़ आया हूँ

किसी से उम्र का रिश्ता
किसी से सांस का बंधन
किसी से जन्मों की कसमें
मैं सबको तोड़ आया हूँ

न जाने कितने लम्हों ने
मुझे आवाज़ दे रोका ...
कि शायद वक़्त से भी अब
मैं चेहरा मोड़ आया हूँ

मगर फिर भी न जाने क्यों
ये वापिस लौटते से हैं
कि जैसे डोर उल्फत की
कोई क़दमों में डाले है ..

वहीँ दरवाजे पर टिक कर
वो जुड़वां मुन्तजिर आँखें
अज़ल से मेरे आने का
सुनहरा ख्वाब पाले हैं .

Wednesday, January 12, 2011

चोर शीशे [कुछ नन्ही नज़्में]


ये शीशे चोर हैं सारे !

ये सारी नाजुकी जो इनकी
परतों ने समेटी है
तुम्हारे लम्स से ली हैं ... !

तुम्हारे सादा दिल सा
इन्होने अपना भेष डाला है ..!

वो जो तहज़ीब है इनको
"जो जैसा है दिखा देना "
तेरी नज़रों से सीखा है..

जो तुम न होते
तो आइनों का क्या होता !

===============================================

जिंदगी
की व्हिस्की
----------------------

मेरी आँखों में
डालो न ,
तुम अपने ख्वाब
का टुकडा ...
कि जिंदगी
फिर छलक जाए मुझ से ...
पैमाने में रखी
व्हिस्की की तरह
जब उसमे बर्फ डलती हैं ...।

================================================

हामिला
उम्मीद
------------------
जल्द ही नज़्म एक पैदा होगी
जल्द ही अफ़साना किलकेगा
दिल के आँगन में…
तेरे विसाल की उम्मीद
हामिला सी नज़र आती है।

हामिला* -- गर्भवती (Pregnant)

Wednesday, December 29, 2010

रिश्ते.......

ऊपर रखना
गुलाब सी रंगत
गहरी परतों में
अश्क़ की तासीर

ये रिश्ते अब
प्याज़ की मानिंद हुए जाते हैं.

===========================

मेरी दौलत
मेरा असबाब था तेरा रिश्ता
आड़े वक़्त के लिए
मुट्ठी में दबा रखा था

खोटे सिक्के सा
हथेली पे निशाँ छोड़ गया.

===========================

मेरे गम पर
उठा लेता है आस्माँ सर पे..
मेरी खुशियों में फलक
नूर से भर देता है

बड़ा बेअदब
वो बेजुबान रिश्ता है...

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जाने कितना
चुका चुका हूँ मैं
कितनी किश्तें
चुकाना बाकी है

वो एक रिश्ता
साहूकार के खाते सा है.

Monday, December 6, 2010

नन्हीं नज़्में

तुम्हारा होना……
======================

मुझे छू कर जो गुजरी थी
तुम्हारे अक्स की खुशबू
अब तो हर शब् मेरी सासें
यूँ ही अफरोज रहती हैं
तुम्हारा होना
"मिडास" की छुअन तो नहीं !


मोती……
======================

स्वाति की इक बूँद
कल मेरी आँख से गिरी थी
तेरी याद की सीपी में

एक नज्म का मोती
आज निकला है वहीँ से


सरगम……
======================

सा सी साँसों में घुलती जाती है
रे सी रेशमी ख्यालों में
ग सी गर्दन प गुदगुदी जैसी
म सी मुस्कान के उजालों में
प सी पनघट पे एक लहर जैसे
ध सी धडकनों में गाती हुई
नी सी निर्मला ज्यों गंगा कि
दर्द सब संग ले के जाती हुई
वो तो सरगम के सप्त -सुर सी है !

मैं जिसपे गीत लिखता जाता हूँ !

Tuesday, October 26, 2010

प्रिज्म और ब्लैक होल


शक्सियत मेरी दुनिया में
किसी सूरज कि मानिंद थी
कि जिसमें आग थी केवल
दहकती,रूह झुलसाती...

तुम आई जो मेरे पास
कोई प्रिज्म हो जैसे ..
मेरे अंतस को सहलाया
तो कितने रंग बिखरे हैं

गुलों को बैगनी रंगत
लहर को नील बख्शा है
फलक है आसमानी सा
धनक धरती पे रखा है

फुलाई पीली सरसों का

हवाओं में घुला है रंग
वो रंगत केसरी सी है
जो बैठी है शफक के संग

हया ने जो चुना है रंग
वो लाली मुझसे बिखरी है
तेरी ही सादगी में घुल

ये रंगत मेरी निखरी है

मगर अब भी मेरी जाना
है दिल में आरज़ू बाकी
कि तुम न प्रिज्म सी होकर
उफक कि ब्लैक होल होती ...

मेरा रौशन हर एक कतरा
फकत तेरे लिए होता ..
मैं बस तुझसे गुजरता
और तेरी आगोश में सोता

Saturday, October 23, 2010

अमर -बेल




सुना हैं मैंने ,
पेड़ों पर जब
अमर -बेल की लत्ती
कोई चढ़ जाती हैं ..
घूँट -घूँट कर
पी जाती हैं तने को उसके ..
और घने जंगल को
खाली कर जाती हैं ....

तुम आओ न ,
एक रोज तो दिल में
और लिपटो इस से
अमर -बेल सी ...
देखो तो
इस दिल में कितने
दर्द के जंगल
उग आये हैं .....
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