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Monday, March 26, 2012

नयनन छवि, पी की बसे मोरे रामा ...

नयनन छवि, पी की बसे मोरे रामा ...
धरम कहे, मति हरि संग जोडूँ 
सदगति, सतफल  पाऊं ....
करम कहे बस जगतहीं उलझूं    ..
व्यर्थ न मन भरमाऊं ..

मन जोगी सुध कोई न ले जोई
पी परे कोई न कामा ssss...
नयनन छवि, पी की बसे मोरे रामा ...!

दिन बीते पथ इक टुक  तकते
निशि बीते सपनाहीं ......
काल -पहर सब बीतत जैहें ...
पीऊ पर आवत नाही ....

हरि विनती मुख कौन करूँ जिस
मुख पीऊ आठों यामाssss ....
नयनन छवि, पी की बसे मोरे रामा !!

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आस्था -अनास्था ,सफलता और संघर्ष के निरंतर  द्वन्द से गुजरते हुए बस एक ही संबल होता है मेरा .... यह गीत उसी दिव्य और पवित्र विश्वास को समर्पित है.

Sunday, November 28, 2010

पवन री ..संदेसा ले जा !!

एक गीत लिखने की कोशिश की है... आप सब के समक्ष रख रहा हूँ ... स्नेह और सुझाव दीजियेगा :
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पवन री !
संदेसा ले जा ........!!

मोरे पी तो..... गए रे बिदेसवा
पाती लिख नहीं पाते ...
तू समझे गति ...मुझ विरहन की
ले चल मुझको उड़ा के

मोहे पीयू का दरस दे जा
पवन री ...... !
संदेसा ले जा ........!!

सूनी गलियन पर...बाट मैं जोहूँ ...
जग-जग दृग पथराये ...
मन मृग बन कर भटके बन-बन
कस्तूरी ना पाए ...

मोहे पी की लगन दे जा ..
पवन री ...... !
संदेसा ले जा ........!!

हिय सुलगे सुन... लाकड़ी जैसे
तू जो हिलोरे खाए ...
मन वीणा की तान बिलखती
प्रियतम तक ना जाए ...

मोहे पी से मिलन दे जा
पवन री ...... !
संदेसा ले जा ........!!

Friday, January 2, 2009

बेकल साँसों के घूँघरू है
















बेकल
साँसों के घुँघरू है,
तू छेड़ सुरीली तान प्रिये,
आ रोक ले गिरते सूरज को,
दिन होने को अवसान प्रिये,

तेरे पथ में बिछी ये आँखें ,
अब देख बुझी सी जाती है,
जो तेरे पग से गति पाती थी,
वो पवन रुकी सी जाती है,
अब विरह मुझसे न सही जाती,
निकले जाते है प्राण, प्रिये,

बेकल साँसों के घुँघरू है,
तू छेड़ सुरीली तान प्रिये.........

तुम जानो मैं व्याकुल कितना,
मैं जानूं तुम भी बावरी सी,
फिर आज मिलन की बेला में,
है जाने यह देरी कैसी,
जब नयन-हृदय-मन प्राण मिले
फिर कैसा अब व्यवधान प्रिये,

बेकल साँसों के घुँघरू है,
तू छेड़ सुरीली तान प्रिये.......!!

Mera saath





















संग उस मोड़ तक हम चलेंगे जहाँ,
हम सफ़र कोई दूजा मिलेगा नहीं...
चाहनेवाले तुमको मिलेंगे बहुत,
पूजने वाला मुझसा मिलेगा नहीं...

फूल ही यूँ तो होते सगुण प्रेम का,
कांटो का ही सही तोहफा तो मिले...
कुछ उजाला तो हो प्रेम की राह में,
दीप के बदले चाहे मेरा दिल ही जले...

हैं पसंद मुझको कांटे कहीं फूल से...
खार फूलों सा मुरझा गिरेगा नहीं....
संग उस मोड़ तक हम चलेंगे जहाँ...
हमसफ़र कोई दूजा मिलेगा नहीं.....................

तुम ना चाहो हमें इसका कुछ गम नहीं,
प्रेम साधन नहीं, साधना हैं मेरी...
मन से मिलना ही मन का, प्रिये, प्रेम हैं,
दूर हो कर भी तुम प्रेरणा हो मेरी...

चाहता ही रहूँगा तुम्हे मैं सदा,
कोई प्रतिदान चाहे मिले या नहीं...
संग उस मोड़ तक हम चलेंगे जहाँ ,
हमसफ़र कोई दूजा मिलेगा नहीं...
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