Wednesday, March 2, 2011

खेल-खेल में …

रस्सा-कशी
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आसमान के प्ले ग्राउंड में
हम-तुम पहुंचे
चाँद से बाँधा सूरज
ज्या की डोरी से

तुमने सिरा
चाँद का थामा
मैंने सूरज थाम लिया

अब रस्सा-कशी का खेल
हुआ करता है हरदम
जो तुमने खींचा
सांझ ढली
जो मैंने खींचा
भोर हुई ।



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स्ट्राईकर

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लोग रहते हैं
गोटियों की मानिंद..
ज़िन्दगी की बिसात
बिखरी पड़ी है ...
कितनी ही बार
छू के गुजरे हैं
अपनी मंजिल का
रास्ता पा कर ...

मैं
सबके साथ बढता जाता हूँ
फिर तनहा लौट आता हूँ
कैरम के स्ट्राईकर की तरह ..

सबके हमसफ़र का
कोई अपना सफ़र नहीं होता !

14 comments:

shikha varshney said...

गज़ब तरह से दिन रात करे हैं ...अल्टीमेट ..

मनोज कुमार said...

अब रस्सा-कशी का खेल
हुआ करता है हरदम
जो तुमने खींचा
सांझ ढली
जो मैंने खींचा
भोर हुई ।
अद्भुत शब्द योजना, बिम्ब और प्रतीक।
ऐसी रचनाएं पढने का सुख अलग ही है।

संजय @ मो सम कौन ? said...

अनुज, स्ट्राईकर बन पाना भी हर किसी के बूते का नहीं। हाँ, इस बात से सहमत हैं कि दूसरों की प्यास बुझाने वाला प्राय: खुद रीता रह जाता है।
लौटते रहो फ़िर से बढ़ने के लिये, जो काम सौंपा है नियति ने वो करना ही चाहिये, चाहे हंसकर करें या रोकर।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

भोर और साँझ का यह खेल एक स्माईली की तरह बिखर गया चेहरे पर, जिसमें एक सिरे पर चाँद था और दूसरे पर सूरज का गोला..
.
एक अनोखा सच... सबके हमसफर का अपना सफर नहीं होता.. सबको मंज़िल तक पहुँचाता हुआ अगर कभी भूल से उसी मंज़िल को अपना मुकाम बना ले तो फ़ाईन भरना पड़ता है बेचारे को!!
.
रवि शंकर भाई! आज तो भोले शंकर बने हो... साधुवाद!!

क्षितिजा .... said...

मैंने जो अभी अभी पढ़ा है उस पर यहीं नहीं हो रहा ...'रस्सा-कशी' क्या कहूँ .. क्या ख़याल है ... पढ़ते ही एक मुस्कराहट सी दौड़ गयी चेहरे पर ... और स्ट्राईकर bhi कमाल है ... बहुत खूब :)

saanjh said...

कैरम के स्ट्राईकर की तरह ..

सबके हमसफ़र का
कोई अपना सफ़र नहीं होता !

u kno what buddy.....u ve just scaled a new altitude in ur poetry with this....theres no looking back now

kya kahoon, this is what i call, intelligent poetry....kam shabdon mein ek khaas baat kehna...speechless buds....this is too good..!!!





PS hihihihi, inna bak bak karne ka baad bolti hoon speechless, lol
;)

richa said...

wow... love this ...

अब रस्सा-कशी का खेल
हुआ करता है हरदम
जो तुमने खींचा
सांझ ढली
जो मैंने खींचा
भोर हुई ।


and this...

मैं
सबके साथ बढता जाता हूँ
फिर तनहा लौट आता हूँ
कैरम के स्ट्राईकर की तरह ..

सबके हमसफ़र का
कोई अपना सफ़र नहीं होता !


खेल खेल में इतनी प्यारी नज़्में लिख डालीं आपने तो... ग़लत कहते हैं लोग कि खेलोगे कूदोगे तो होगे ख़राब :)

'साहिल' said...

उम्दा ख्यालों को सुन्दर शब्दों में पिरोया है आपने !

VIJUY RONJAN said...

सबके हमसफ़र का
कोई अपना सफ़र नहीं होता !

shabdon ka chunav bahut accha hai aur bhav bhi...
Carrom ki goti ka sateek chitran...bahut khoob

Rahul Singh said...

नयापन और भाने वाली ताजगी.

Manpreet Kaur said...

bouth he aacha post hai aapka dear aacha laga
Visit my blog plz friends...
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Amrita Tanmay said...

Ravi jee , samiksha ki paridhi men rachana kaid ho jati hai ..kuchh na kaha jaye to bistrit aakash ko chhu leti hai...meri nayi rachana ki do panktiyan visheshrup se aapke liye..

Shekhar Suman said...

वंस अपोन ए टाइम आप लिखा करते थे.... :(

Sonal Rastogi said...

Waah

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