Sunday, February 20, 2011

मुझको तू कर दे ...

समा ले खुद में मुझे और मुझको तू कर दे
रगों में दर्द जमा है, उसे लहू कर दे ।

मेरी हयात के लम्हों पे नाम उसका हो
मेरी वफ़ा को खुदा बस मेरा जुनू कर दे ।

वो गर उठे तो झुका दे फलक परस्तिश में
नज़र मिले तो निगाहों को बावजू कर दे* ।

खुले हैं जख्म कई , रिस रहा है पैराहन
है कोई इल्म जो निस्बत को भी रफू कर दे ?

मैं सारी उम्र तेरी ख्वाहिशों के नाम हुआ
तू एक बार फकत , मेरी आरज़ू कर दे !


* के निशान वाला मिसरा "मिसरा-ए-सानी" है जिसकी तरह (रदीफ़ और कफ़िये पर) ये ग़जलनुमा चीज आप सब के सामने जलवाफ़रोश हुई है :)

19 comments:

संजय @ मो सम कौन ? said...

"इन शेरों को, इन अल्फ़ाजों को जो मानी कर दे,
खुदा, उस जलवागर को मेरे यार के रूबरू कर दे।"


अनुज, ऐसी गज़ल पर निहाल हुआ जा सकता है, निसार हुआ जा सकता है। जियो राज्जा, जियो।
(पढ़कर हंसना मत:))

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

ये सादा लफ्ज़,ये मानी,ये गज़ल के तेवर,
ख़ुदा तू शोहरते रवि को कू ब कू कर दे!

दिपाली "आब" said...

Main tere naam saansein bhi likh dun..
tu ek baar faqat meri aarzu kar de

Aiyaa.. Ittna pyaara misra hai ke kya kahu.. Hehehehe..
Brilliant buddy, bahut pyaari gazal kahi hai.. Loved it.

दिपाली "आब" said...

o teri mujhe nahi pata tha yahan har koi teri gazal pe sher keh raha hai.. Ravi re teri to chal nikli :p

saanjh said...

main bhi kahun.....???

he he ha ha ha.....sher kahun, main...??? itni tehzeeb kahan se laaun, meri naukri to bakwaas karne ki rahi.... ;)

mast ghazal likhi hai yaara, roomaani ho gaye, tooo good

खुले हैं जख्म कई , रिस रहा है पैराहन
है कोई इल्म जो निस्बत को भी रफू कर दे ?

killer......!!!!!!! awesome's not the word, tooo good :)

Avinash Chandra said...

रवि बाबू,
जिसे ग़ज़ल लिखना नहीं आता हो, उसे एंट्री नहीं मिलेगी क्या?
आह!
वाह!
कराह!
(दाद नहीं :)) क़ुबूल फ़रमायें जनाब।

दिगम्बर नासवा said...

खुले हैं जख्म कई , रिस रहा है पैराहन
है कोई इल्म जो निस्बत को भी रफू कर दे ...

बहुत खूब ... बला की खूबसूरत ग़ज़ल है ... हस शेर कमाल का है ...

Kailash C Sharma said...

मेरी हयात के लम्हों पे नाम उसका हो
मेरी वफ़ा को खुदा बस मेरा जुनू कर दे ।

बहुत खूब ! हरेक शेर लाज़वाब..

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

रवि भाई, गजब लिखते हो आप। शुभकामनाएं स्‍वीकारें।

---------
शिकार: कहानी और संभावनाएं।
ज्‍योतिर्विज्ञान: दिल बहलाने का विज्ञान।

daanish said...

मेरी हयात के लम्हों पे नाम उसका हो
मेरी वफ़ा को खुदा बस मेरा जुनू कर दे ।

खूबसूरत जज़्बात
और बहुत खूबसूरत लफ़्ज़ों का लिबास
वाह !!

rashmi ravija said...

मैं सारी उम्र तेरी ख्वाहिशों के नाम हुआ
तू एक बार फकत , मेरी आरज़ू कर दे !

क्या बात है...बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल

Ravi Shankar said...

हुकुम…………

बिल्कुल नहीं हँसा… सच्ची ! :)

दाऊ……

:) :)

दीपी………

हाँ यारा… चल निकली ! तुम सब के पहियों के दम पर :)

साँझू……

हाँ, तो तू अपनी नौकरी ही कर……! कहाँ शेर-गीदड़ मारती फिरेगी :P :P

हे अविनाशी !

"आह !" "वाह !" और "कराह !" तीनों कबूल हुए अब बस "सलाह" की दरकार है :)

संजय भास्कर said...

बहुत खूब ! हरेक शेर लाज़वाब..

Amrita Tanmay said...

गजल जब इतनी खुबसूरत हो तो ...खुशबु की जवां ही...... बोलना पड़ेगा... गुलाब सी महकती हुई गजल..बेहद खुबसूरत ..

richa said...

वो गर उठे तो झुका दे फलक परस्तिश में
नज़र मिले तो निगाहों को बावजू कर दे ।


अब इतना अच्छा भी नहीं लिखना चाहिये कि तारीफ़ के शब्द ही ना जुटा पायें हम जैसे लोग :)
agree wid saanjh... awesome is not the word.... its killer !!!

उस्ताद जी said...

"मैं सारी उम्र तेरी ख्वाहिशों के नाम हुआ
तू एक बार फकत , मेरी आरज़ू कर दे !"
वाह
वाह
क्या बात है .... कुर्बान
ग़ज़ल क्या बस गजब है

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

प्रिय बंधुवर रविशंकर जी
सस्नेहाभिवादन !

दानिश जी जैसे गंभीर सुख़नवर किसी रचना पर कुछ कहदें , उसके बाद कुछ नहीं बचता … :)

बहुत ख़ूब ! मुबारकबाद !

बसंत ॠतु की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

mridula pradhan said...

behad khoobsurat.

Ravi Shankar said...

नासवा जी…

कैलाश जी…

ज़ाकिर भाई…

दानिश जी……

रश्मि जी…

आप सबों ने स्नेह दिया … आभारी हूँ !

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