Saturday, October 2, 2010

चाय की पत्ती




जिंदगी ...
वक़्त की आंच पर
उबल रही हैं और
उड़ती जाती हैं ..
भाप होती हुई ..
बेरंग और बेस्वाद सी ..

बस एक चम्मच
वफ़ा का ले आओ
और अपने तसव्वुर का
इक मीठा टुकडा ..

फिर देखो ..
लम्हों की हर घूँट
तमाम उम्र को ..
जिस्मो -जेहन में
ताज़गी सी भर देगी ..

तुम्हारी वफ़ा तो बस चाय की पत्ती सी हैं ।

8 comments:

saanjh said...

chai to kuch roz pehle maine bhi parosi thi apne blog pe. par iska zaayka..kuch alag hai. bohot khoob hai.

rock on buddy....

Avinash Chandra said...

Ufff sir ji!!!!!!!!!
kash ke chai ham bhi pite hote :P

Prakash Jain said...

तुम्हारी वफ़ा तो बस चाय की पत्ती सी हैं ।

Wah! kya baat hai....bahut khoob

www.poeticprakash.com

सुनीता शानू said...
This comment has been removed by the author.
सुनीता शानू said...
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सुनीता शानू said...

यह सूचना टिप्पणी बटोरने हेतु नही है बस यह जरूरी लगा की आपको ज्ञात हो आपकी किसी पोस्ट का जिक्र यहाँ किया गया है कृपया अवश्य पढ़े आज की ताज़ा रंगों से सजीनई पुरानी हलचल

Ravi Shankar said...

Bahut shukriya sunita ji

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri said...

वाह बहुत खूब चाय के बिम्बो के माध्यम से जीवन को सुन्दर बनाने की कल्पना ..बहुत सुन्दर भाव....

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