Wednesday, October 20, 2010

तेरे ख़याल की खिड़की




दिल के तख्ते पे धड़कन
ठक-ठक सी बजती है ..
किसी बढ़ई के
हथौडे की मानिंद ..

दर्द की कील से
यादों के खांचे कसता ..
वक़्त रन्दे सा
बरसों के जिस्म
छीलता रहता है अक्सर ..
और लम्हों के बुरादे
बिखड़े पड़े है देखो ...

जाने किस रोज
मुकम्मल होगी
तेरे ख़याल की खिड़की
मैं जिसको
जिंदगी की दीवार में जड़ कर
तेरे तसव्वुर की रौशनी
पीने का रास्ता निकालूँगा...!

17 comments:

monali said...

Very complex poem... i guess dat i cudnt get da depth.. bt i loved da pic...

Ravi Shankar said...

अगर वाकई poem complex हो गई है तो मैं बहुत माफ़ी चाहता हूँ मोनाली जी ! यह रचना की असफलता है मेरी नज़र में, अगर वह पढने वालों से न जुड़ पाए .

पर मैं कोशिश करता हूँ इसके ख़याल को simplify करने की ....

"कविता किसी carpenter द्वारा एक खिड़की बनाने के प्रोसेस पर बसेड है बस उसके औज़ार थोड़े अलग हैं...वक़्त बढई [carpenter] है ,दर्द की कील (nail) है ..धड़कन का हथौड़ा (hammer) और यादों से बनी हुई frame है वो वर्षों (period) की लकड़ी से बनी हुई है...रंदा एक ऐसा औज़ार होता है जो लकड़ी को छीलने के काम आता है और बढई वक़्त द्वारा वर्षों की लकड़ी को छीलने का परिणाम ही हैं वो बुरादे जिन्हें हम लम्हों के नाम से जानते हैं ... नज़्म-गो बस इसी इंतज़ार में है की उसके महबूब के ख़याल की खिड़की का निर्माण कब पूरा हो ताकि वह उसे अपनी ज़िन्दगी की दीवार में जड़ कर अपने प्रिय की एक झलक पा सके "

एक बार फिर क्षमा-प्रार्थी हूँ..... और आपका आभारी भी !

saanjh said...

chup oye....bohot bolte ho by god....'क्षमा-प्रार्थी, रचना की असफलता' ....oye hoye....inni vaddi vaddi baatein...uff

acchi hai, bohot acchi hai, koi asafalta ni hai...khush reh ;D

क्षितिजा .... said...

bahut sunder abhiyakti ravi ji....

दर्द की कील से
यादों के खांचे कसता ..
वक़्त रन्दे सा
बरसों के जिस्म
छीलता रहता है अक्सर ..
और लम्हों के बुरादे
बिखड़े पड़े है देखो ...

bahut khoob...

वन्दना said...

सुन्दर बिम्बो के माध्यम से खूबसूरती से भावो को संजोया है।
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (22/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

वाणी गीत said...

जाने किस रोज मुकम्मल होगी
तेरे ख्यालों की खिड़की ...
वाह ...सुन्दर अभिव्यक्ति ...!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

khayalon ki khidaki zindagi ki deewaar men jad hi jayegi ...khoobsurat abhivyakti

Avinash Chandra said...

To log sentiyapa failana seekh gaye hain?

sahi hai prabhu...keep it up :P

baki nazm pe kah dun...itni quality hai kya mere paas?

दिपाली "आब" said...

ravi n avi..
Dono mast hain
i mean ravi ki kavita aur avi ka comment.. I agree ravi sentipana faila raha hai, yaaron iska byaah kara do, khidki ki jagah saamne baitha do usko..fir ye sentipana nhi failayega... Heheheh

ana said...

बहुत सुन्दर रचना .........पंक्ति पंक्ति अति सुन्दर

Dorothy said...

गहन संवेदनाओं की बेहद मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति. आभार.
सादर
डोरोथी.

Ravi Shankar said...

@ Buddy !

Chalo yaar... chup ho gaya ! aur tumhare aane se khush bhi ho gaya !

Stay blessed

@ Kshitija ji

@ Vandana ji

@ Vaani-geet ji

@ Sangeeta di..

Aap sabhi logon ko naman ! Apna sneh banaye rakhieyga !

Ravi Shankar said...

@ Avi Dev...

Aisi to pyaar se taang na khinchiye sir ji.... ! "Sentiyapa" failaya na nahi failaya hum ne par ye ek naya word jaroor jaankaari mein paaya hum ne.. :P

chaliye kaha suna maaf---kyonki yahan buddhi hai saaf.. :)

Ravi Shankar said...

@ DP i.e Deepi urf match-maker ji..

hmmm.. to byaah ka muhurt humara aur khushi se aap uchhal padin madam ji..... aapne koi commission nahi milna hai... :P

aur rahi sentipana failane ki baat.. to senti-mental to hum hain hi.. senti yahan logon mein fail gaya aur hum mental bach gaye :D he he he

Ravi Shankar said...

@ Ana ji...

@ Dorothy ji..

Aap donon ka bahut bahut dhanyavaad evam aabhaar karti hai kalam, rachna ko sneh dene ke liye !

ZEAL said...

दर्द की कील से
यादों के खांचे कसता ..
वक़्त रन्दे सा
बरसों के जिस्म
छीलता रहता है अक्सर ..
और लम्हों के बुरादे
बिखड़े पड़े है देखो ...


Beautiful creation !

Badhaii !

.

संजय भास्कर said...

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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