Thursday, October 14, 2010

मेरा नाम मुकम्मल हो जाए ...

आगाज़ जो हो तेरे हाथों से, अंजाम मुकम्मल हो जाए ,
मेरा नाम जुड़े तेरी हस्ती से, मेरा नाम मुकम्मल हो जाए ...

दुनियावालों ने यूँ मुझपर , तोहमत तो हजारों रखी हैं ..
एक तू जो दीवाना कह दे ,इल्जाम मुकम्मल हो जाए ...

ये फूल ,धनक , माहताब , घटा , सब हाल अधूरा कहते हैं
तू छू ले अपनी आँखों से , पैगाम मुकम्मल हो जाए ...

मैं दिन भर भटका करता हूँ , लम्हों की सूनी बस्ती में ..
जो गुजरे तेरी यादों में , वो शाम मुकम्मल हो जाए ...

दे दुनिया मुझको दाद भले ,अंदाज़-ए-सुखन हैं खूब 'रवि '..
एक तेरा तबस्सुम और मेरा , ईनाम मुकम्मल हो जाए ...

8 comments:

दिपाली "आब" said...

badhiya gazal hai ravi

monali said...

Kya baat h.. behatareen... umda.. tareef shayad kam h....

एक तू जो दीवाना कह दे ,इल्जाम मुकम्मल हो जाए ...
beautiful lines... :)

वन्दना said...

बहुत सुन्दर्।

saanjh said...

beautiful..!

great job buddy :)

Shekhar Suman said...

बहुत ही ख़ूबसूरत रचना...
आपकी कलम का यही तो जादू है..
यूँही लिखते रहें..
मेरे ब्लॉग में इस बार...ऐसा क्यूँ मेरे मन में आता है....

दिपाली "आब" said...

again
मैं दिन भर भटका करता हूँ ,
लम्हों की सूनी बस्ती में ..
जो गुजरे तेरी यादों में , वो शाम मुकम्मल
हो जाए ...
Beautiful

Ravi Shankar said...

Bahut bahut shukriya doston ! aapka sneh meri kalam ko hausla deta hai... ise banaye rakhiyega !

@ Deep.....

oye do do baar tareef... ki gal hai ?? :P

Utkarsh said...

Very nice poem.

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