Wednesday, December 1, 2010

मेरी तहरीर में तुझसा शरर नहीं आया

बिछड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया
सफ़र में उसके कहीं अपना घर नहीं आया

होके मायूस सपर जा गिरा शिकंजे में
बिना कफस उसे दाना नज़र नहीं आया

वो एहतराम से करते हैं खूँ भरोसे का
हमें अब तक भी मगर ये हुनर नहीं आया

मेरे वादे का जुनूँ देख, तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वाबों में भी तेरा ज़िकर नहीं आया

लगा दे आग हर महफ़िल में नमूं होते ही
मेरी तहरीर में तुझसा शरर नहीं आया

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहजे में तुमसा ज़हर नहीं आया

है "रवि" मील का पत्थर कि जिसके हिस्से में
अपनी मंजिल ,कभी अपना सफ़र नहीं आया

26 comments:

संजय भास्कर said...

अरे वाह क्या ग़ज़ल लिखी है... बहुत खूब .

संजय भास्कर said...

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहजे में तुमसा ज़हर नहीं आया
एक एक शेर गज़ब का है, बेहद शानदार अभिव्यक्ति।

क्षितिजा .... said...

ravi ji ye gazal maine pehle bhi padhi hai ... tab bhi bahut pasand aayi thi ... ab bhi bahut pasand aayi ...

saanjh said...

haye....lovely yaara...kya ghazal likkhi hai...qatl...!!!


होके मायूस सपर जा गिरा शिकंजे में
बिना कफस उसे दाना नज़र नहीं आया

awwwesome....kya sher hai, kya thought pakda hai...


लगा दे आग हर महफ़िल में नमूं होते ही
मेरी तहरीर में तुझसा शरर नहीं आया

wahh !!! kya baat hai, kya khoob baat hai....bohot badhiya

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहजे में तुमसा ज़हर नहीं आया

uffffff......ispar to dafa 302 lagwaani padegi...!!


है "रवि" मील का पत्थर कि जिसके हिस्से में
अपनी मंजिल ,कभी अपना सफ़र नहीं आया

chaa gaye yaara....kamaal kittan tussi....oye too good yaara, toooooo good


P.S. What the hell...! ab main kahan se galtiyaan nikaalun...tum log khit pit vi ni kanne dete aajkal :(

वन्दना said...

वो एहतराम से करते हैं खूँ भरोसे का
हमें अब तक भी मगर ये हुनर नहीं आया

मेरे वादे का जुनूँ देख, तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वाबों में भी तेरा ज़िकर नहीं आया

वाह! क्या खूब लिखा है…………गज़ब्।

रश्मि प्रभा... said...

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहजे में तुमसा ज़हर नहीं आया
waaaaaaaaah

रश्मि प्रभा... said...

प्रिज्म और ब्लैक होल... yah rachna vatvriksh ke liye chahiye rasprabha@gmail.com per parichay aur tasweer ke saath

Vandana ! ! ! said...

ख़ूबसूरत गज़ल!. सभी पंक्तियाँ एक से बढ़कर एक.

rashmi ravija said...

मेरे वादे का जुनूँ देख, तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वाबों में भी तेरा ज़िकर नहीं आया

बहुत खूब....बेहतरीन लिखा है.

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (2/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

Shekhar Suman said...

वाह क्या ग़ज़ल है मार ही डाला.... एक एक शेर शानदार है....
मेरे वादे का जुनूँ देख, तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वाबों में भी तेरा ज़िकर नहीं आया
उफ़...

Shekhar Suman said...

मुट्ठी भर आसमान...

Aashu said...

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहजे में तुमसा ज़हर नहीं आया

mazaa aa gaya!

Aashu

फ़िरदौस ख़ान said...

बिछड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया
सफ़र में उसके कहीं अपना घर नहीं आया

बहुत ख़ूब...

मो सम कौन ? said...

"वो एहतराम से करते हैं खूँ भरोसे का
हमें अब तक भी मगर ये हुनर नहीं आया"

basic character नहीं बदलता इंसान का। ये हुनर आता नहीं है, जन्मजात होता है।
शुरू से अंत तक एक एक शेर बहुत खूब है।

मनोज कुमार said...

संवेदनशील रचना।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पूरी गज़ल ही बहुत शानदार है ..एक से बढ़ कर एक शेर ..कोई एक का चयन नहीं कर पायी ...

'अदा' said...

वो एहतराम से करते हैं खूँ भरोसे का
हमें अब तक भी मगर ये हुनर नहीं आया

bahut hi khoobsurat hain saare ke saare ashaar...

अतुल प्रकाश त्रिवेदी said...

वाह! बहुत खूब !

Ravi Shankar said...

@ भास्कर साहब…

@ क्षितिजा जी…

@ सान्झू…

चल यारा… दो एक दिन में ऐसा कुछ डालूँगा जिस में गलतियाँ हीं गलतियाँ होंगी… फिर कर लेना जी भर के खिट-पिट। अब खुश हो जा :)

@ वन्दना गुप्ता जी…

पुनः आभारी हूँ आपका जो आपने अपनी परिचर्चा में ग़जल को जगह दी।

@ रश्मिप्रभा जी…

@ वन्दना जी…

@ रश्मि रवीजा जी…

@ शेखर जी…

@ आशु जी…

@ फ़िरदौस जी…

@ संजय सर…

@ मनोज जी…

@ संगीता दी…

@ अदा जी…

@ त्रिवेदी साहब……

आप सभी सुधीजनों को अशेष धन्यवाद। आपका स्नेह ही कलम का सम्बल है… इसे बनाये रखिएगा।

सादर !

Kailash C Sharma said...

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहजे में तुमसा ज़हर नहीं आया ..

हरेक शेर अपने आप में लाज़वाब ..बहुत सुन्दर गज़ल..बधाई

dev said...

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहजे में तुमसा ज़हर नहीं आया


दुश्मनी और दोस्ती पहले भी होती थी मगर,

इस कदर माहौल का माहौल जहरीला ना था...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

रविशंकर जी! सारे अशार नयापन और ताज़गी लिए एक नए शायर के आमद कि इत्तिला देते हैं.

Amrita Tanmay said...

आपका सलीका दिल जीत लिया ...हर एक शेर लाजवाब ..बधाई

saanjh said...

@ सान्झू…

चल यारा… दो एक दिन में ऐसा कुछ डालूँगा जिस में गलतियाँ हीं गलतियाँ होंगी… फिर कर लेना जी भर के खिट-पिट। अब खुश हो जा :)



hmmmm.....chaar din ho gaye.....ho kahan???

Ravi Shankar said...

@ kailash ji...

@ dev ji...

@ Salil sir....

@ Amrita ji...

Bahut shukriya aapka ! Yun hi saath banaye rakhiyega !

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