Tuesday, November 2, 2010

कुछ दोहे गण/गन तन्त्र के ……




(1)
गणतंत्र भला अब देश में कैसे इज्जत पाए !
जब "गन"तंत्र से चुना हुआ,नेता कुर्सी पे आये!!
(2)
गणतंत्र के वृक्ष का, निज लाभ बना है मूल !
बस वही मूल तो फूल है,बाकी सब त्रिशूल !!
(3)
बैंक बैलेंस उन्नति आहे,सब उन्नति को मूल !
निज उन्नति पर गौर करो,राष्ट्र पे डालो धूल !!
(4)
सारे दिन हैं उलट-फेर के,माल कमाना काम !
गणतंत्र दिवस अवकाश का,सारी मिटे थकान !!
(5)
लूट लिया धन देश का,बाँध पोटली गाँठ !
लोकतांत्रिक देश में,लोग ही भटके बाट !!
(6)
भ्रष्ट लोकमत देख के,गणतंत्र पकड़ता कान !
गन ही हैं गणतंत्र में, अब कुर्सी कि जान !!

6 comments:

उस्ताद जी said...

3/10

बेतुके दोहे
प्रभावहीन

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

रविशंकर जी, इस बार असर गुम हो गया.. मैंने पहले भी कहा था.. ग़ज़लें हों या दोहे, मात्राओं और मीटर का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है!!

क्षितिजा .... said...

tecnically क्या सही और क्या गलत होता है इसका मुझे ज्यादा पता नहीं है ... पर मुझे रचना का भाव बहुत पसंद आया...

रवि जी आप जो कहना कहते है रचना के माध्यम से वो असरदार है ...

जहां तक उस्ताद जी की बात है ... वो बहुत strict marking करते हैं ... लिखते रहिये एक दिन 10 भी मिलेंगे..

आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामाएं ...

राजभाषा हिंदी said...

सुंदर। बहुत अच्छी प्रस्तुति। दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई! राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है!
राजभाषा हिन्दी पर – कविता में बिम्ब!

संजय भास्कर said...

हर बार की तरह शानदार प्रस्तुति

आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामाएं ...

Ravi Shankar said...

@ श्रीमन्……

धन्यवाद बन्धु, आईना दिखाने के लिये ! दरअसल ये दोहे बस एक प्रयोग के तौर पर लिखे थे क्योन्कि दोहे मेरे लिये एक बिल्कुल नयी विधा हैं……! 3 मिल गये 10 में ,बडी बात है…… ! आते रहियेगा !

@ सलिल जी…

जी सर, असर इसलिये गुम हो गया क्योंकि कथ्य प्रेषित नहीं हो पाया सही ढंग से…… और तकनीकियाँ बहर और मात्राओं की सीखने की कोशिश में हूँ ! आपकी बहुमूल्य टिप्पणी के लिये धन्यवाद !

@ क्षितिजा जी……

आपका भी धन्यवाद ! जैसे जब दो बड़े डान्टते हैं बच्चे को तो कोइ एक पुचकारने भी चला आता है…… आपकी टिप्प्णी ने ऐसे ही पुचकारा मुझे ! और कोशिश तो है लगातार बेह्तर होते जाने की…… यूँ सीखना तो ताउम्र चलता रहता है…… :)

@ "राजभाषा… " महोदय एवं

@ संजय भास्कर जी…

बहुत धन्यवाद आपका !

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