आज कल बे-ईमान
बहुत हो गये हो तुम.
वजूद अपना जो छोड़ा था
तुम्हारी निगहबानी में...
उसका कतरा भी कोई
अब नही मिलता मुझको
वो सब तुमने छुपा
कर रख लिया है
और इंतेहाँ ये
कि इक इल्ज़ाम
बेवफ़ाई का
मेरे सर कर दिया है
करार-ए-ज़िंदगी
के वो कुछ सफ़हे
जिन्हे चश्मदीद रखा था
ये सब कुछ सौंपते तुमको
तुम्हारे हक़ में
गवाही देने लगे हैं
मुक़दमा ख़ास है ना ये
अदालत ये तुम्हारी है ,
मुद्दई तुम, तुम्हीं मुन्सिफ
वकालत भी तुम्हारी है.
लो मैं कबूलता हूँ
जुर्म अपना...!
सुनो, अब फ़ैसले में
देर मत करो जानाँ ...
अपने आगोश में
उम्र-क़ैद की सज़ा दे दो!
एक तेरी मोहब्बत ने बनाया हैं खुदा मुझको,मैं रोज खल्क करता हूँ नया संसार ग़ज़ल में..
Tuesday, December 6, 2011
Wednesday, November 23, 2011
मेरे हमसफ़र तू बिछड़ गया ...
मेरे हमसफ़र तू बिछड़ गया !
मगर फिर भी क्यों तेरी आहटें
मेरे जेहन-ओ-दिल में खनक रहीं ...
तेरे जिस्म में थीं जो खुशबुएँ
मेरे बाम-ओ-दर पे महक रहीं ...
क्यों तेरे ख़याल का अंजुमन
है फलक का नूर बना हुआ
वो तबस्सुमों का हिजाब है
मेरे सोच-ओ-सच पे तना हुआ
मेरी ज़िन्दगी का हर एक गुल
क्यों है तेरे नाम खिला हुआ ...
मेरी सांस का हर तार क्यों
तेरी धडकनों से मिला हुआ ...
मेरे हमसफ़र जो हुआ है ये
कि तू दिख रहा है ख़फ़ा-ख़फ़ा
गर सच है ये तो मुझे बता
कि तू कब है मुझसे जुदा हुआ ...
मेरे हमसफ़र तू बिछड़ गया ...
मगर मुझसे कब है जुदा हुआ .
मगर फिर भी क्यों तेरी आहटें
मेरे जेहन-ओ-दिल में खनक रहीं ...
तेरे जिस्म में थीं जो खुशबुएँ
मेरे बाम-ओ-दर पे महक रहीं ...
क्यों तेरे ख़याल का अंजुमन
है फलक का नूर बना हुआ
वो तबस्सुमों का हिजाब है
मेरे सोच-ओ-सच पे तना हुआ
मेरी ज़िन्दगी का हर एक गुल
क्यों है तेरे नाम खिला हुआ ...
मेरी सांस का हर तार क्यों
तेरी धडकनों से मिला हुआ ...
मेरे हमसफ़र जो हुआ है ये
कि तू दिख रहा है ख़फ़ा-ख़फ़ा
गर सच है ये तो मुझे बता
कि तू कब है मुझसे जुदा हुआ ...
मेरे हमसफ़र तू बिछड़ गया ...
मगर मुझसे कब है जुदा हुआ .
Sunday, September 25, 2011
इष्टा को समर्पित...
वह विजय में है मेरी और हार में भी
शीर्ष पे और मध्य में, आधार में भी
मनसा-वाचा-कर्मणा में वो समाहित
वह पृथन में भी मेरे, अभिसार में भी
आरोहण-अवसान इष्टा को समर्पित
मेरा हर इक गान इष्टा को समर्पित...
जेठ में है, पूस में है, फाग में वो
विधि रचित हर कण में है, हर भाग में वो
वृक्ष की हर पात के कलरव में गुंजित
विहग के झुण्डों के हर इक राग में वो
रात्रि-रज़ हर बूँद उसके आचमन में
हर नया विहान इष्टा को समर्पित
मेरा हर इक गान इष्टा को समर्पित...
मैं भ्रमित हूँ,मुझ में या परिवेश में है
मैं हूँ उसके या वो मेरे वेश में है
मन की हर संवेदना है जनित उससे
वो मेरे अनुराग में है , द्वेष में है
अश्रु और मुस्कान इष्टा को समर्पित
मेरा हर इक गान इष्टा को समर्पित...
शीर्ष पे और मध्य में, आधार में भी
मनसा-वाचा-कर्मणा में वो समाहित
वह पृथन में भी मेरे, अभिसार में भी
आरोहण-अवसान इष्टा को समर्पित
मेरा हर इक गान इष्टा को समर्पित...
जेठ में है, पूस में है, फाग में वो
विधि रचित हर कण में है, हर भाग में वो
वृक्ष की हर पात के कलरव में गुंजित
विहग के झुण्डों के हर इक राग में वो
रात्रि-रज़ हर बूँद उसके आचमन में
हर नया विहान इष्टा को समर्पित
मेरा हर इक गान इष्टा को समर्पित...
मैं भ्रमित हूँ,मुझ में या परिवेश में है
मैं हूँ उसके या वो मेरे वेश में है
मन की हर संवेदना है जनित उससे
वो मेरे अनुराग में है , द्वेष में है
अश्रु और मुस्कान इष्टा को समर्पित
मेरा हर इक गान इष्टा को समर्पित...
Thursday, September 8, 2011
कहो क्या नाम दूँ तुमको !
कहो क्या नाम दूँ तुमको !
सहर में तुम,शफक़ में तुम
परिंदों की चहक में तुम,
परस्तिस में, इबादत में
सलीके में, नफ़ासत में
लिखावट में, ज़बानी में
मेरी हर इक कहानी में....
तसव्वुर बस तुम्हारा है ।
मेरी साँसें, मेरी धड़कन
ये मेरी रूह का पैराहन
तेरे सदके मेरी जाना
ये इंतेज़ाम सारा है...
मेरी शोहरत, मेरी चाहत
मेरी रुसवाइयां तुम से
मेरी नफ़रत, मेरी तोहमत
मेरी अच्छाईयाँ तुम से
मैं क्या ईनाम दूँ तुमको !
मैं क्या इल्ज़ाम दूँ तुमको !
कहो क्या नाम दूँ तुमको ?
==============================================================
तुम्हारी याद भर से नज़्म…
रक्स करती है काग़ज पर…
तसव्वुर से तुम्हारे,
शेर सब परवाज़ भरते हैं…
तेरे आगोश में सिमटूँ
तो मैं गुलज़ार हो जाऊँ…!
सहर में तुम,शफक़ में तुम
परिंदों की चहक में तुम,
परस्तिस में, इबादत में
सलीके में, नफ़ासत में
लिखावट में, ज़बानी में
मेरी हर इक कहानी में....
तसव्वुर बस तुम्हारा है ।
मेरी साँसें, मेरी धड़कन
ये मेरी रूह का पैराहन
तेरे सदके मेरी जाना
ये इंतेज़ाम सारा है...
मेरी शोहरत, मेरी चाहत
मेरी रुसवाइयां तुम से
मेरी नफ़रत, मेरी तोहमत
मेरी अच्छाईयाँ तुम से
मैं क्या ईनाम दूँ तुमको !
मैं क्या इल्ज़ाम दूँ तुमको !
कहो क्या नाम दूँ तुमको ?
==============================================================
तुम्हारी याद भर से नज़्म…
रक्स करती है काग़ज पर…
तसव्वुर से तुम्हारे,
शेर सब परवाज़ भरते हैं…
तेरे आगोश में सिमटूँ
तो मैं गुलज़ार हो जाऊँ…!
Thursday, August 11, 2011
दर्द की जाने शख्सियत क्या है …!
दर्द की जाने शख्सियत क्या है !
किसी के दिल में मोम जैसा है
छलक पड़ता है रूह जलते ही
कभी जलता है उम्र भर को ये
कोई परवाना संग मिलते ही
कभी रिसता है पानियों कि तरह
जेहन की दीवारों को नमी देकर
कभी ताबीर ये मुहब्बत की
किसी की चाह को जमीं दे कर
कभी पत्थर सा सख्त होता है
दिल की धड़कन को सर्द करता हुआ
कभी मखमल के उजले फाहे सा
किसी नफ़रत के जख्म भरता हुआ
किसी की याद के धुएँ जैसा
कभी अम्बर में घुलता जाता है
कभी पारे सा मनचला हो कर
किसी भी सिम्त बढ़ता जाता है ...
दर्द की जाने शख्सियत क्या है !
किसी के दिल में मोम जैसा है
छलक पड़ता है रूह जलते ही
कभी जलता है उम्र भर को ये
कोई परवाना संग मिलते ही
कभी रिसता है पानियों कि तरह
जेहन की दीवारों को नमी देकर
कभी ताबीर ये मुहब्बत की
किसी की चाह को जमीं दे कर
कभी पत्थर सा सख्त होता है
दिल की धड़कन को सर्द करता हुआ
कभी मखमल के उजले फाहे सा
किसी नफ़रत के जख्म भरता हुआ
किसी की याद के धुएँ जैसा
कभी अम्बर में घुलता जाता है
कभी पारे सा मनचला हो कर
किसी भी सिम्त बढ़ता जाता है ...
दर्द की जाने शख्सियत क्या है !
Thursday, July 7, 2011
ये इंतेज़ार जाएगा कब तक ...
तर्क-ए-ताल्लुक निभाएगा कब तक
वो मुझे आज़माएगा कब तक
हद कोई होगी बे-नियाज़ी की
हमसे दामन बचाएगा कब तक
उम्र दहलीज़ पे शमाँ कर दी
वो भी देखें ना आएगा कब तक
ये तश्ना-लब, ये भूख-लाचारी
खुदा ये दिन दिखाएगा कब तक
तीरगी जुगनूओं के बस की नही
जाने सूरज वो लाएगा कब तक
दिल गया होश गया साँसें भी
ये इंतेज़ार जाएगा कब तक
वो मुझे आज़माएगा कब तक
हद कोई होगी बे-नियाज़ी की
हमसे दामन बचाएगा कब तक
उम्र दहलीज़ पे शमाँ कर दी
वो भी देखें ना आएगा कब तक
ये तश्ना-लब, ये भूख-लाचारी
खुदा ये दिन दिखाएगा कब तक
तीरगी जुगनूओं के बस की नही
जाने सूरज वो लाएगा कब तक
दिल गया होश गया साँसें भी
ये इंतेज़ार जाएगा कब तक
Friday, July 1, 2011
यूँ सीने से न लगा मुझको....
ए मेरे दोस्त
यूँ सीने से न लगा मुझको ...
दर्द कोई
फिर न छलक जाए
मेरे जख्मों से ...
बाँध कर जब्त कर
रखा है जिसे
कोई आंसू न ढलक आये
मेरी नज्मों से ...
ए मेरे दोस्त ......
यूँ सीने से न लगा मुझको !
मेरी आँखों में
रौशनी नजर आई जो तुम्हे
वो मेरी सुलगी हुई
धड़कन के सिवा कुछ भी नहीं
ख़ाक हो जाए न
ये रेशमी दामन तेरा
मेरी मोहब्बत का अब
हासिल है सिला कुछ भी नहीं
ए मेरे दोस्त ......
यूँ सीने से न लगा मुझको
मैं तो टूटा हुआ
एक तारा हूँ
उफक के दरिया में
डूबता सा कहीं
तू मुझको बाँधने की
न तमन्ना कर
मेरे संग तू भी बिखर
न जाए कहीं ...
ए मेरे दोस्त ......
यूँ सीने से न लगा मुझको
यूँ सीने से न लगा मुझको ...
दर्द कोई
फिर न छलक जाए
मेरे जख्मों से ...
बाँध कर जब्त कर
रखा है जिसे
कोई आंसू न ढलक आये
मेरी नज्मों से ...
ए मेरे दोस्त ......
यूँ सीने से न लगा मुझको !
मेरी आँखों में
रौशनी नजर आई जो तुम्हे
वो मेरी सुलगी हुई
धड़कन के सिवा कुछ भी नहीं
ख़ाक हो जाए न
ये रेशमी दामन तेरा
मेरी मोहब्बत का अब
हासिल है सिला कुछ भी नहीं
ए मेरे दोस्त ......
यूँ सीने से न लगा मुझको
मैं तो टूटा हुआ
एक तारा हूँ
उफक के दरिया में
डूबता सा कहीं
तू मुझको बाँधने की
न तमन्ना कर
मेरे संग तू भी बिखर
न जाए कहीं ...
ए मेरे दोस्त ......
यूँ सीने से न लगा मुझको
Subscribe to:
Posts (Atom)