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Tuesday, November 2, 2010

कुछ दोहे गण/गन तन्त्र के ……




(1)
गणतंत्र भला अब देश में कैसे इज्जत पाए !
जब "गन"तंत्र से चुना हुआ,नेता कुर्सी पे आये!!
(2)
गणतंत्र के वृक्ष का, निज लाभ बना है मूल !
बस वही मूल तो फूल है,बाकी सब त्रिशूल !!
(3)
बैंक बैलेंस उन्नति आहे,सब उन्नति को मूल !
निज उन्नति पर गौर करो,राष्ट्र पे डालो धूल !!
(4)
सारे दिन हैं उलट-फेर के,माल कमाना काम !
गणतंत्र दिवस अवकाश का,सारी मिटे थकान !!
(5)
लूट लिया धन देश का,बाँध पोटली गाँठ !
लोकतांत्रिक देश में,लोग ही भटके बाट !!
(6)
भ्रष्ट लोकमत देख के,गणतंत्र पकड़ता कान !
गन ही हैं गणतंत्र में, अब कुर्सी कि जान !!
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