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Sunday, September 25, 2011

इष्टा को समर्पित...

वह विजय में है मेरी और हार में भी
शीर्ष पे और मध्य में, आधार में भी
मनसा-वाचा-कर्मणा में वो समाहित
वह पृथन में भी मेरे, अभिसार में भी

आरोहण-अवसान इष्टा को समर्पित
मेरा हर इक गान इष्टा को समर्पित...

जेठ में है, पूस में है, फाग में वो
विधि रचित हर कण में है, हर भाग में वो
वृक्ष की हर पात के कलरव में गुंजित
विहग के झुण्डों के हर इक राग में वो

रात्रि-रज़ हर बूँद उसके आचमन में
हर नया विहान इष्टा को समर्पित
मेरा हर इक गान इष्टा को समर्पित...

मैं भ्रमित हूँ,मुझ में या परिवेश में है
मैं हूँ उसके या वो मेरे वेश में है
मन की हर संवेदना है जनित उससे
वो मेरे अनुराग में है , द्वेष में है

अश्रु और मुस्कान इष्टा को समर्पित
मेरा हर इक गान इष्टा को समर्पित...

Thursday, June 9, 2011

या मैं मरघट सा हो बैठा...

मैं अब भी निपट अकेले में
हर रोज ढूंढता हूँ उत्तर
या तुम ही सरगम हो ना सकी
या मैं मरघट सा हो बैठा

जब हमने चाहा था हर क्षण
एक स्नेहिल मौन से भर जाए
उस चुप की मुस्काती धुन पर
कोई गीत प्रणय का छिड़ जाए

लेकिन अब तो ना जाने क्यों
है चीख भरी सन्नाटों में
जो आलिंगन करने को थे
सिमटे हैं स्वप्न कपाटों में

निज-आहूति से अर्जित था
एक पल में पुण्य वो खो बैठा
या तुम ही सरगम हो ना सकी
या मैं मरघट सा हो बैठा

विश्वास रचित निज-नौका में
दिग-पाल बने थे संवेदन
हम प्रेम मगन थे विचर रहे
यह जीवन सरिता मनभावन

वो छिद्र कौन सा था जो उसे
शंका-सिंधु में डूबो बैठा
या तुम ही सरगम हो ना सकी
या मैं मरघट सा हो बैठा

Sunday, May 15, 2011

मैं कैसे लूँ स्वीकार...

प्रिय !मैं कैसे लूँ स्वीकार,
तुम्हारे स्नेह का उपहार ?
मेरा पथ है अश्रु विगलित,
शूल - कंकर, कष्ट-मिश्रित

वेदना ही पूंजी अर्जित
मेरा शोक का व्यापार...
प्रिय !मैं कैसे लूँ स्वीकार,
तुम्हारे स्नेह का उपहार...?

प्रीत का ना भान मुझको
स्नेह का ना ज्ञान मुझको
सृष्टि में हर पग मिले हैं
पीड़ा के प्रतिमान मुझको

कैसे तेरे रंग रंगूँ…
मेरा स्याह है संसार ।
प्रिय ! मैं कैसे लूँ स्वीकार,
तुम्हारे स्नेह का उपहार.?

विधि-रंक सा हूँ जन्मना मैं
मुस्कान की हूँ वर्जना मैं
एक फीका रंग मेरा…
सौ रंग तेरी अल्पना में

मैं कदाचित् दे ना पाऊँ
तेरे स्वप्न को आधार...
प्रिय ! मैं कैसे लूँ स्वीकार,
तुम्हारे स्नेह का उपहार ?

Sunday, February 13, 2011

हे मौनव्रती कुछ तो बोलो......!

हो दम साधे यूँ मौन खड़े,
क्यों हो यूँ मृतप्राय पड़े,
चुप्पी तोड़ो, मुंह का खोलो,
हे मौनव्रती कुछ तो बोलो......

युग परिवर्तित करने को
क्रांति की, राह थामनी होती है,
कुछ करने को, करने की
मन में, चाह थामनी होती है,
कल्पना को दो उड़ान,
मन के दरवाजों को खोलो,
हे मौनव्रती कुछ तो बोलो....!

पीड़ा-प्रताड़ना के भय से ,
तुम चुप्पी कब तक साधोगे,
अन्याय व शोषण सहने की
बोलो क्या सीमा बाँधोगे,
अब तो उठ कर विद्रोह करो,
अपनी शक्ति को तोलो,
हे मौनव्रती अब तो बोलो...!

साक्षी हैं इतिहास की जब भी
मौन बनी चिंगारी है,
पापों की चिता है धधक उठी,
हुई नतमस्तक सृष्टि सारी है,
जागो, जग का नेतृत्व करो,
बढ़ व्योम-सितारों को छू लो,
हे मौनव्रती अब तो बोलो....... !

Friday, January 21, 2011

मैं शब्द बेचता हूँ साहब... !

जी हाँ ...
मैं शब्द बेचता हूँ साहब... !

चौबीसों घंटे
खुली रहती है मेरी दूकान ...
जब मन चाहे आइये ..
और अपने काम के शब्द
ले जाइए.. !

जैसी जरूरत
वैसे ही रेट हैं..
और कुछ सौदे
छूट समेत हैं..!

नेताओं का
विशेष स्वागत है !
बस अगले महीने
चुनाव की आहट है !

गुणगान, स्तुति
या फिर तालियाँ ...
या विरोधियों को देनी हों
ब्रांडेड गालियाँ...

नहीं,घबराइए नहीं !
ये काम नहीं
कानून के विरुद्ध है ..
क्योंकि यहाँ मिलावट भी
सौ फीसदी शुद्ध है ..

पत्रकारों को यहाँ
मिलती बड़ी छूट है
दस सच्ची खबरों पर फ्री
सौ सफ़ेद झूठ है ...

ब्रेकिंग
और एक्सक्लूसिव खबरें
यहाँ उपलब्ध हैं
कई वेरायटी में…
और TRP की गारंटी है
आज की सोसाइटी में ।

चलिए आप के लिए ,
सिर्फ आपके लिए
एक दाम लगा दूंगा
थोक ग्राहक से
कोई फायदा क्या लूँगा ...

बस इन्ही शब्दों के
हेर-फेर से
चलती अपनी दूकान है
और यकीन जानिये
समाज में अपना
बहुत सम्मान है ...

क्योंकि अब
समाज के घोड़े पर
अंगूठाछाप टट्टू सवार है
और इन्ही के पीछे करबद्ध खड़ा
ये आज का साहित्यकार है ....!!

Thursday, November 25, 2010

तुम जीवन उनमें भर देना ..

मैं साँसें वारूँ तुम पर
तुम जीवन उनमें भर देना ..

जीवन उपवन मृतप्राय अभी
हुए व्यर्थ मेरे उपाय सभी
मैं लाख जतन कर के हारा
मन-पुष्प नहीं खिल पाए कभी

मैं झुलसा मन सौपूं तुमको
तुम सिंचन उसका कर देना
मैं साँसें वारूँ
तुम पर
तुम जीवन उनमें भर देना ..

मानस पे जम गई धूल प्रिये
अब झूठ दिखे स्थूल प्रिये
अब लोभ मोह लालच मद में
भूला जीवन का मूल प्रिये

मैं अपने भाव तुम्हे दे दूं
तुम पावन उनको कर देना..
मैं साँसें वारूँ
तुम पर
तुम जीवन उनमें भर देना ..

है द्वेष भरा यह जीवन अब
बस आशाओं का क्रंदन अब
सुलग सुलग स्वाहा होता
बेमतलब तन का चन्दन अब

इस जग की प्रेम समिधा में
तुम अर्पण इसको कर देना
मैं साँसें वारूँ
तुम पर
तुम जीवन उनमें भर देना ..

Thursday, November 11, 2010

यक्ष - प्रश्न काल के-2




तमाम साथियों/सुधी जनों की सलाह के बावजूद पिछ्ली दो रचनाओं की ही अगली कड़ी रख रहा हूँ आपके समक्ष, क्योंकि अगर कोइ अन्य कविता डाली तो श्रृंखला अधूरी रह जायेगी…… सो गुजारिश है कि कम से कम एक मर्तबा और झेलिए इस खुराफ़ात को…… और इस पर अपने विचार भी रखिये।

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हे कोशलेश !

कहे जाते हो तुम मापदंड
उत्तम-अनुकरणीय आर्य
आचरण के ...
किन्तु कुछ शंकाएँ हैं
अंतर में ...
उत्तर दे पाओगे ??

क्या मर्यादित था
वध बाली का ...
जिस पर किया था घात
परोक्ष तुमने ...
मित्र की सहायता की
ओट में ??

क्या मानते हो
अनुकरण योग्य
परित्याग मैथिली का ...
एक अनर्गल प्रलाप पर
जिसकी सत्यता के साक्षी
स्वयं तुम थे ??

कभी खड़े हो पाओगे
समक्ष उर्मिला के ... ?
जिसने त्याग दिया
अपना भाग्य
तुम्हारा भाग्य
सँवारने को ...

यदि निभानी थी मित्रता
करते स्वस्थ युद्ध
मित्र के अधिकार हेतु ...

निर्भीक घोषित करते साक्ष्य
जानकी की पवित्रता के
तब प्रकट होता
पुरुषार्थ तुम्हारा ...

सर्वथा रहते कृतज्ञ
अनुज के ...
जिसे त्याग का प्रतिदान
दिया था तुमने ...

क्षमा करना नृपश्रेष्ठ !
किन्तु कदाचित लेना पड़े
नव-जन्म तुमको
मर्यादा-पुरुषोत्तम होने को !

Tuesday, November 9, 2010

यक्ष - प्रश्न काल के-1


सुनो पार्थ !

है साहस तुम में ??
उठाओ गांडीव अपना
तान दो प्रत्यंचा
और सिद्ध कर दो स्वयं को
धनुर्धर सर्वश्रेष्ठ ...!

किन्तु रुको ...
क्या एकलव्य समक्ष
ठहर पाओगे ?
क्या वाणी कर पाओगे
अवरुद्ध वाचाल श्वान की ?
क्या दे पाओगे
आहूति रक्तिम ,
गुरु-यज्ञ की ज्वाला में ?

यदि दे भी पाओ ये,
तो क्या किसी याचक को
दे दोगे अपनी साधना सम्पूर्ण ?
क्या पाल पाओगे प्रण अपना
मूल्य पे अपने प्राणों के
कर्ण की भाँति ??

यद्यपि,
तुम धनी हो धनुष के
और सदा-हरित तूणीर तुम्हारा !
निस्संदेह विजयी भी ...
शायद इसलिए इतिहास पर
अधिकार तुम्हारा !

किन्तु हे धनुर्धर ,
विजय मेरी दृष्टि में
कदापि साधन नहीं
सर्वश्रेष्टता के मानक का !

Wednesday, November 3, 2010

वीरता का इतिहास






वीर सदा हंस कर पलता हैं ,
असि पर और शरों पर,
जिसकी गाथा खेला करती ,
सदा जगत अधरों पर

वीरत्व सदा जाना जाता हैं ,
अपने तेज प्रखर से ...
साहस रखता जो तोड़ सितारे
ले आने का अम्बर से

सच हैं , वीरता ही रख सकती
हैं विजय की चाह ...
पर हैं सच्चा वीर सदा
जो चले धर्म की राह

वही विजय हैं पूज्य की जिसमे
निहित भुजा का बल हो ...
नहीं कोई भी कपट कोई
लेश मात्र भी छल हो

कहते हैं की वीर पार्थ सम
हुआ कोई जग में ...
पर क्या था कोई मुकाबला
उसमे और एकलव्य में ?

क्या ठहर सकता था कोई
कर्ण समक्ष समर में ..
महाकाल ही स्वयं बसा था
जिस महाबली के शर में

द्रोण-भीष्म सम महारथी भी
मारे गए कपट से ...
वरन काल भी जीत पाता क्या
इन महावीर उद्भट से !

माना कि था भीम सुशोभित
सौ हाथियों के बल से ...
पर कुरुराज पर उसकी विजय भी
क्या नहीं हुई थी छल से

नीति कहती हैं गदा -प्रहार
सदा होता कटि के ऊपर ...
किन्तु भीम ने गदा हनी थी
दुर्योधन की जंघा पर !

ह्रदय सन्न कर देती थी
दुर्योधन की चीत्कार ...
हा ! धर्मराज के भ्राता ने ही
दिया धर्म को मार ... !

लज्जित थी मानवता,
पांचाली का
जब हरण हुआ था चीर ...
कर बांधे बैठे रह गए थे
अर्जुन भीम सम वीर

पर सच हैं यह भी कि वीरता
फिर निर्वस्त्र हुई थी ...
धर्म -युद्ध में कर्ण की हत्या
जब निः -शस्त्र हुई थी !

इतना ही नहीं पूर्व में भी
मर्यादा का हुआ हरण था ...
मर्यादा-पुरूषोत्तम ने जब कपट से
जय का किया वरण था

महावीर बालि जिसको
जीत सका कोई बल से ...
राम ने छिपकर संहार किया था
उसका भी तो छल से

कुटिलता से होती हैं दूषित
शूरता साफ़ - सुवर्ण
वीरत्व के अधिकारी हैं सच्चे
अभिमन्यु और कर्ण

इनके इंगित ओर ही विधि की
रेख मुडी जाती हैं ...
ऐसे पुत्र ही पा जननी की
छाती जुडी जाती हैं


शब्दार्थ : असि - तलवार, कटि - कमर, इंगित - निर्देशित !

Sunday, October 17, 2010

तुम अगर दो साथ...


तुम अगर दो साथ...
मैं जग के नए प्रतिमान गढ़ लूँ. ...

मैं भटक रहा हूँ विस्मित ...
विस्मृति के पथ पे किंचित ...
मार्ग हैं अवरुद्ध आगे .. ..
लक्ष्य भी है अब तिरोहित ...

तुम से पा कर राह फिर से ..
मैं नए सोपान गढ़ लूँ. .....
तुम अगर दो साथ ..
मैं जग के नए प्रतिमान गढ़ लूँ !

माथे की हैं रेख काली ...
और भाग्य का लेख खाली
संपदा इस कृपणता की
मैंने वर्षों है संभाली

प्रीत की स्याही से फिर मैं
विधि का नया विधान गढ़ लूँ. ..
तुम अगर दो साथ ..
मैं जग के नए प्रतिमान गढ़ लूँ !

मैं राग से भटका हुआ सुर ,
लय बस छुट जाने को आतुर ...
गान मेरा छीन न ले ..
ये समय की धुन है निष्ठुर

श्वास की हर लय पे तेरे
मैं कई अनुतान गढ़ लूँ. ..
तुम अगर दो साथ ..
मैं जग के नए प्रतिमान गढ़ लूँ !

Tuesday, October 12, 2010

हथियार कलम बन जायेगी ..


देनी है फिर आज चुनौती,
सत्ता के गलियारों को

गूंगा कर देना है फिर से

धर्म जात के नारों को ..

हो समान अधिकार, बराबर

कद हो सबकी हस्ती का ..
एक कौम हो,एक ही मजहब,
केवल वतनपरस्ती का ..

जिस दिन ऐसे संकल्पों की हूंकार कलम बन जायेगी ..
उस दिन जन-जन के हाथों का हथियार कलम बन जायेगी ..

आज सभी धृधराष्ट्र बने हैं

इस सत्ता के धंधे पर

सर लोकतन्त्र का झूल रहा है

भ्रष्टाचार के फ़न्दे पर्…

संसद है फिर द्युत-क्रीड़ा

गृह सी सजी हुई ..
है आन वतन की

आज दांव पर लगी हुई ..

जिस दिन अर्जुन के धन्वा की टंकार कलम बन जायेगी

उस दिन जन-जन के हाथों का हथियार कलम बन जायेगी..

जिन्दा लोगों की बस्ती में

फिर मरघट सा सन्नाटा है…
सच कहना तो है दूर, ह्रदय

सच सुनने से थर्राता है ..

जीते रहना कुछ भी सह कर,
क्या जीवन का आधार यही ..
जब तक बाकी हो सांस हमें
अन्याय न हो स्वीकार कभी ..

जिस दिन अश्रु के बदले रक्त की धार कलम बन जायेगी ..
उस दिन जन-जन के हाथों का हथियार कलम बन जायेगी ..

Friday, October 8, 2010

तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....


जब उर -अंतर में पीड़ा हो
तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....

जाडों में फुटपाथों पर
जब रात सिसकती रहती हो
फटे चिथरों में लिपटी

जब भूख बिलखती रहती हो

जब तन में क्षुधा हो रोटी की
तब चाँद प्रिया दिखे कैसे
जब उर -अंतर में पीड़ा हो
तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....

जब चौराहों पर ये बचपन

भट्ठी -चूल्हे में सिंकता हो
जब अबलाओं का वस्त्र-वरण

रुपयों -पैसों में बिकता हो

तब अश्रु -बीज से उपजा जो
चुम्बन के मोल बिके कैसे
जब उर -अंतर में पीड़ा हो
तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....

घुटती मर्माहत चीखों से
जब राष्ट्र दग्ध हो जलता हो

जब लहू शिराओं में नख -शिख
हो कर उद्विग्न उबलता हो

तब जग -पीड़ा के सम्मुख फिर
भला निज की चाह टिके कैसे
जब उर -अंतर में पीड़ा हो
तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....

Friday, October 1, 2010

भाव कहाँ से लाऊं मैं


तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ..

तुम मेरे विचारों की मेधा
तुम शब्दों का अनुकूल चयन
तुम सब दृश्यों का परिपेक्ष्य
तुम ही हो कवि का अंतर्मन ...

तुम बिन अपनी रचना के
निहितार्थ कहाँ से पाऊं मैं
तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ..

तुम सब रागों की सरगम हो
तुम साँसों का आरोहन
तुम नृत्यों की भाव -भंगिमा
तुम्ही कलाएं मनभावन ...

तुम न हो तो तबले पर
पद -क्षेप कहाँ बैठाऊं मैं
तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ..

तुम रंगों की परिभाषा
तुम चित्रों का संदर्श प्रिये ..
तुम जड़ छाया को चेतन करती
तूलिका का स्पर्श प्रिये ...

तुम बिन जीवन के चित्र -पटल पर
जड़ होके न रह जाऊं मैं ...
तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ....

Wednesday, December 31, 2008

तेरा -मेरा क्या रिश्ता है














तेरा मेरा क्या रिश्ता हैं ,
क्या मैं जग को बतलाऊँ ,
क्या परिभाषा दूं मैं इसकी
किन उपमानों से समझाऊँ ?


मेरी साँसें मेरा जीवन ,
मेरी धड़कन की आवाज़ हो तुम ,
मेरी चाहत मेरे अरमाँ,
मेरे ख्वाबों की परवाज़ हो तुम .


तुम हो हर वो शब्द
मेरी कलम लिखा जो करती है,
तुम ही वो मुस्कान
मेरे होठों पे रहा जो करती है,


तुम ही मेरी सोच ,
तुम ही हो अभिव्यक्त मेरे भावों में ,
तुम ही मंजिल और तुम्ही हो ,
हमसफ़र मेरी राहों में

मैं ढूँढू जब बाहर तुमको
खुद में तुमको मैं पाऊँ ,
तुमको पाने की चाहत में ,
खुद तुझमे खोता जाऊं ....

तेरा -मेरा क्या रिश्ता है...
क्या मैं जग को बतलाऊँ ...

जब तेरी मेरी बातें होती
तब भाषा मौन हो जाती है ,
मैं और तुम की अलग -अलग
पहचान गौण हो जाती है ..

जो बंध नहीं सकता शब्दों में
ये मौन उसी की परिभाषा है ,
इतना विशाल यह सम्बन्ध -स्वरुप
इतनी विराट यह गाथा है .

इसको बतलाने को शब्द कोश में 

मुझको मिलते हैं शब्द नहीं ,
इसको लिखने में कलम मेरी
रुक जाती है निस्तब्ध कहीं ..

इस अनबूझे रिश्ते को जग
गर समझो मुझको बतलाना ,
पर याद रहे अब शेष नहीं
मेरा -तेरा , खोना पाना ..

जितना सुलझाऊं इस उलझन को ,
इसमें उतना मैं उलझा जाऊं ,
तेरा -मेरा क्या रिश्ता है
क्या मैं जग को बतलाऊँ . ...
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