Friday, October 8, 2010

तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....


जब उर -अंतर में पीड़ा हो
तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....

जाडों में फुटपाथों पर
जब रात सिसकती रहती हो
फटे चिथरों में लिपटी

जब भूख बिलखती रहती हो

जब तन में क्षुधा हो रोटी की
तब चाँद प्रिया दिखे कैसे
जब उर -अंतर में पीड़ा हो
तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....

जब चौराहों पर ये बचपन

भट्ठी -चूल्हे में सिंकता हो
जब अबलाओं का वस्त्र-वरण

रुपयों -पैसों में बिकता हो

तब अश्रु -बीज से उपजा जो
चुम्बन के मोल बिके कैसे
जब उर -अंतर में पीड़ा हो
तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....

घुटती मर्माहत चीखों से
जब राष्ट्र दग्ध हो जलता हो

जब लहू शिराओं में नख -शिख
हो कर उद्विग्न उबलता हो

तब जग -पीड़ा के सम्मुख फिर
भला निज की चाह टिके कैसे
जब उर -अंतर में पीड़ा हो
तब कलम प्रेम लिखे कैसे ....

Sunday, October 3, 2010

उस रात तुम्हारे आने का ...


उस रात
तुम्हारे आने का
इमकान हुआ था जब मुझको ....

मैंने झट से उफक की छत पर
टांगा था एक चाँद नया ,
और बादल के एक फाहे से
फिर आसमान को साफ़ किया ....

उस रोज सितारों की ऊपर ..
एक झिलमिल चादर टाँगी थी ,
और पुरवाई से चुपके से
भीनी सी खुशबू मांगी थी ..

कि आओगे और भर लोगे
तुम मुझको अपनी बांहों में
और शब् सारी शब् थिरकेगी ...
पाजेब पहन के पांवों में ...

अठ -खेली होगी अपनी ..
जगते ख्वाबों की बस्ती में ...
दूर फलक के पार चलेंगे
पूनम की सुनहरी कश्ती में ....

देखो हर रात यूँ ही ..
तेरी आमद की ख्वाहिश में
मैं घर को सजाता रहता हूँ
और दिल को दिलासा देता हूँ ...
तुम आओगे ...बस चल ही दिए ..
रस्ते में हो ...अब पहुंचोगे ...

उस रात
तुम्हारे आने का
इमकान हुआ था जब मुझको ....

Saturday, October 2, 2010

चाय की पत्ती




जिंदगी ...
वक़्त की आंच पर
उबल रही हैं और
उड़ती जाती हैं ..
भाप होती हुई ..
बेरंग और बेस्वाद सी ..

बस एक चम्मच
वफ़ा का ले आओ
और अपने तसव्वुर का
इक मीठा टुकडा ..

फिर देखो ..
लम्हों की हर घूँट
तमाम उम्र को ..
जिस्मो -जेहन में
ताज़गी सी भर देगी ..

तुम्हारी वफ़ा तो बस चाय की पत्ती सी हैं ।

Friday, October 1, 2010

भाव कहाँ से लाऊं मैं


तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ..

तुम मेरे विचारों की मेधा
तुम शब्दों का अनुकूल चयन
तुम सब दृश्यों का परिपेक्ष्य
तुम ही हो कवि का अंतर्मन ...

तुम बिन अपनी रचना के
निहितार्थ कहाँ से पाऊं मैं
तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ..

तुम सब रागों की सरगम हो
तुम साँसों का आरोहन
तुम नृत्यों की भाव -भंगिमा
तुम्ही कलाएं मनभावन ...

तुम न हो तो तबले पर
पद -क्षेप कहाँ बैठाऊं मैं
तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ..

तुम रंगों की परिभाषा
तुम चित्रों का संदर्श प्रिये ..
तुम जड़ छाया को चेतन करती
तूलिका का स्पर्श प्रिये ...

तुम बिन जीवन के चित्र -पटल पर
जड़ होके न रह जाऊं मैं ...
तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ....

Thursday, September 30, 2010

मेरे हमनफस तू जो साथ हो..


मेरे हमनफस तू जो साथ हो
तो किसे मंज़िलों की तलाश हो

चाहे हो बहारों की रहबरी
या कि खार चलते हों हमकदम
वो सफ़र रहेगा सुकूँ भरा
मेरे हाथों में जो तेरा हाथ हो

मेरे हमनफस ! तू जो साथ हो..
तो किसे मंज़िलों की तलाश हो..

चाहे राह निकले खलाओं से
या कि उड़ के गुजरें घटाओं से
कोई दस्त-ओ-दरिया हो रूबरू
या चलें ज़न्नती फ़ज़ाओं से

हर एक शय होगी मय-छलक
चाहे जैसी भी कायानात हो
मेरे हमनफस तू जो साथ हो
तो किसे मंज़िलों की तलाश हो

जो कदम मेरे कभी गिर पड़ें
कभी हौसला ज़मींदोज़ हो
कभी रूह निकल जाए जिस्म से
ये कोई हादसा किसी रोज़ हो

मुझे थाम लेना सनम मेरे
किसी डर की फिर क्या बिसात हो
मेरे हमनफस ! तू जो साथ हो..
तो किसे मंज़िलों की तलाश हो..

Latitudes




स्कूल में टंगे
दुनिया के नक्शे पर
कितनी ही आड़ी -टेढी
लकीरें हुआ करती थीं .....

क्लास में
जिन का पढ़ कर हम
दुनिया की मनचाही जगहें
ढूंढ लिया करते थे ...

मैं फिर
माज़ी की क्लास में बैठा ...
उम्र के
latitudes को पढना
सीख रहा हूँ ..

कि जिंदगी के नक्शे पर
लम्हों की उस बस्ती को
फिर से दूंढ़ सकूं ..
जहाँ मैं और तुम
अब भी साथ रहा करते हैं ... !

Monday, May 10, 2010

खुदा सा हो जाऊंगा मैं भी .


मैं उस रोज
देर शाम
दरिया पे बैठा था ...

लहरों पे चस्पा
तुम्हारा चेहरा
देर तक तकता रहा था मुझको ..
और मेरे अन्दर ही अन्दर
तुम बहती रही थी मीलों ...

किनारों की मिटटी
को घिसती लहरें
शायद
रास्ता बदल रहीं थी दरिया का ....
और मैं भी उसी मिटटी की मानिंद
घुलता जा रहा था तुझमे ...

मेरे कतरे अब तुझमे
मिल चुके हैं ....
और सफ़र करते हैं
अब तेरे संग ही ..
तुम्हारी तलहटी में
कहीं अन्दर ..
चाहे तुम जितना भी
रास्ता बदल लो ....

जब किसी समंदर में
मिलने से पहले
तुम मुझको डाल दोगी
किसी अपने ही साहिल पर
फिर मैं जन्म दूंगा
जाने कितने दरख्तों को .
और तुम्हारी खुदाई
का कुछ हिस्सा लेकर
खुदा सा हो जाऊंगा
मैं भी .
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