Saturday, October 2, 2010

चाय की पत्ती




जिंदगी ...
वक़्त की आंच पर
उबल रही हैं और
उड़ती जाती हैं ..
भाप होती हुई ..
बेरंग और बेस्वाद सी ..

बस एक चम्मच
वफ़ा का ले आओ
और अपने तसव्वुर का
इक मीठा टुकडा ..

फिर देखो ..
लम्हों की हर घूँट
तमाम उम्र को ..
जिस्मो -जेहन में
ताज़गी सी भर देगी ..

तुम्हारी वफ़ा तो बस चाय की पत्ती सी हैं ।

Friday, October 1, 2010

भाव कहाँ से लाऊं मैं


तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ..

तुम मेरे विचारों की मेधा
तुम शब्दों का अनुकूल चयन
तुम सब दृश्यों का परिपेक्ष्य
तुम ही हो कवि का अंतर्मन ...

तुम बिन अपनी रचना के
निहितार्थ कहाँ से पाऊं मैं
तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ..

तुम सब रागों की सरगम हो
तुम साँसों का आरोहन
तुम नृत्यों की भाव -भंगिमा
तुम्ही कलाएं मनभावन ...

तुम न हो तो तबले पर
पद -क्षेप कहाँ बैठाऊं मैं
तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ..

तुम रंगों की परिभाषा
तुम चित्रों का संदर्श प्रिये ..
तुम जड़ छाया को चेतन करती
तूलिका का स्पर्श प्रिये ...

तुम बिन जीवन के चित्र -पटल पर
जड़ होके न रह जाऊं मैं ...
तुम बिन गीत भले रच दूँ
पर भाव कहाँ से लाऊं मैं ....

Thursday, September 30, 2010

मेरे हमनफस तू जो साथ हो..


मेरे हमनफस तू जो साथ हो
तो किसे मंज़िलों की तलाश हो

चाहे हो बहारों की रहबरी
या कि खार चलते हों हमकदम
वो सफ़र रहेगा सुकूँ भरा
मेरे हाथों में जो तेरा हाथ हो

मेरे हमनफस ! तू जो साथ हो..
तो किसे मंज़िलों की तलाश हो..

चाहे राह निकले खलाओं से
या कि उड़ के गुजरें घटाओं से
कोई दस्त-ओ-दरिया हो रूबरू
या चलें ज़न्नती फ़ज़ाओं से

हर एक शय होगी मय-छलक
चाहे जैसी भी कायानात हो
मेरे हमनफस तू जो साथ हो
तो किसे मंज़िलों की तलाश हो

जो कदम मेरे कभी गिर पड़ें
कभी हौसला ज़मींदोज़ हो
कभी रूह निकल जाए जिस्म से
ये कोई हादसा किसी रोज़ हो

मुझे थाम लेना सनम मेरे
किसी डर की फिर क्या बिसात हो
मेरे हमनफस ! तू जो साथ हो..
तो किसे मंज़िलों की तलाश हो..

Latitudes




स्कूल में टंगे
दुनिया के नक्शे पर
कितनी ही आड़ी -टेढी
लकीरें हुआ करती थीं .....

क्लास में
जिन का पढ़ कर हम
दुनिया की मनचाही जगहें
ढूंढ लिया करते थे ...

मैं फिर
माज़ी की क्लास में बैठा ...
उम्र के
latitudes को पढना
सीख रहा हूँ ..

कि जिंदगी के नक्शे पर
लम्हों की उस बस्ती को
फिर से दूंढ़ सकूं ..
जहाँ मैं और तुम
अब भी साथ रहा करते हैं ... !

Monday, May 10, 2010

खुदा सा हो जाऊंगा मैं भी .


मैं उस रोज
देर शाम
दरिया पे बैठा था ...

लहरों पे चस्पा
तुम्हारा चेहरा
देर तक तकता रहा था मुझको ..
और मेरे अन्दर ही अन्दर
तुम बहती रही थी मीलों ...

किनारों की मिटटी
को घिसती लहरें
शायद
रास्ता बदल रहीं थी दरिया का ....
और मैं भी उसी मिटटी की मानिंद
घुलता जा रहा था तुझमे ...

मेरे कतरे अब तुझमे
मिल चुके हैं ....
और सफ़र करते हैं
अब तेरे संग ही ..
तुम्हारी तलहटी में
कहीं अन्दर ..
चाहे तुम जितना भी
रास्ता बदल लो ....

जब किसी समंदर में
मिलने से पहले
तुम मुझको डाल दोगी
किसी अपने ही साहिल पर
फिर मैं जन्म दूंगा
जाने कितने दरख्तों को .
और तुम्हारी खुदाई
का कुछ हिस्सा लेकर
खुदा सा हो जाऊंगा
मैं भी .

Saturday, August 1, 2009

तुम्हारी याद तो खुदा सी है


मेरे लम्हों को उम्र बख्शी है ..
तुम्हारी याद तो खुदा सी है ..

तुम्हारा लम्स हैं गुलों पे अभी ,
इनमे खुशबू जो ये बला सी है ..

राज कुछ हैं तेरे तबस्सुम में ,
इसके परदे में एक उदासी है..

सांस की लौ धुआं होने को है ...
जख्म ताजा हैं , जिस्म बासी है

अब सिमटने ही को हैं उम्र--सफ़र ...
बस कि दुश्वारी इक जरा सी है ...

तेरी सूरत हैं मेरा आब - -जमजम ...
, कि सदियों से रूह प्यासी है ...

Tuesday, April 7, 2009

फातिहा




अभी भी याद हैं तुमको ,
जो तुमने की थी मुझे
ताकीद कभी ,
कि
"तुम्हारे नज्मों में कभी
मैं न रहूँ "
जाने कौन सा डर था तुमको ......

तो आ कर देख लो हमदम ...
मैं उस ताकीद को आज भी
दिल -ओ -जान से मानता हूँ ...
मेरी नज्मों में कहीं भी
तुम नहीं हो .....

मगर ,
वो नज्में ही अब
नज्में कहाँ हैं ...
न उनमे एहसास हैं कोई
न कोई जान बाकी हैं ...
वो बस एक फातिहा सी हैं ..
मैं जिनको पढता रहता हूँ ..
अपने रिश्ते कि मैय्यत पर ...

मैं तेरे बिन
बेमकसद ही स्याही घिस रहा हूँ
मैं आज कल
बस मुर्दा नज्में लिख रहा हूँ .
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